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गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished634 pages

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Page 443

काण्ड ] अच्युतस्तोत्र ४३३

इच्छा रखनेवाला उससे मुक्त हो जाता है। इस स्तोत्रके पाठसे रोगी रोगसे छुटकारा प्राप्त कर लेता है, निर्धन व्यक्ति धनवान् बन जाता है और विद्यार्थी विद्या, भाग्य तथा कीर्ति प्राप्त करता है। जातिस्मरत्व (पूर्वजन्मके वृत्तान्तकी स्मृति) तथा और जो कुछ चित्तमें इच्छा रखता है, भक्त उसे प्राप्त कर लेता है।

वह प्राणी धन्य है, सब कुछ जाननेवाला है, बुद्धिमान् है, साधु है, सभी सत्कर्मोंका कर्ता है, सत्यवादी है, पवित्र है और दाता है, जो भगवान् पुरुषोत्तमकी स्तुति करता है। इस संसारमें वे प्राणी सम्भाषण करने योग्य नहीं हैं और समस्त धर्मोंसे बहिष्कृत हैं, जिनका कोई भी सत्कार्य भगवान् हरिके उद्देश्यसे सम्पन्न नहीं होता। वह व्यक्ति दुरात्मा है, उसका मन और वचन शुद्ध नहीं है, जिसकी सब कुछ प्रदान करनेवाले भगवान् विष्णुमें अचल भक्ति नहीं है।

मनुष्य सब सुख प्रदान करनेवाले भगवान् हरिकी विधिवत् पूजा कर जो कुछ भी कामना करता है उसे प्राप्त कर लेता है। श्रद्धापूर्वक आराधना करनेपर पुरुषोत्तमभगवान् सब कुछ प्रदान करते हैं। समस्त मुनि जिन देवका चिन्तन करते हैं, वे ही शुद्ध ब्रह्म परब्रह्म हैं। जो सभीके हृदयमें विराजमान रहते हैं, जो सब कुछ जानते हैं और जो सभी कृत्योंके साक्षी हैं, जो भय-मरण-विहीन हैं, नित्य-आनन्दस्वरूप हैं, ऐसे अज, अमृत, ईश वासुदेवको मैं नमस्कार करता हूँ। मैं समस्त संसारके स्वामी, सुप्रसन्न, शाश्वत, अति विमल, विशुद्ध, निर्गुण, आत्मस्वरूप और समस्त सुखोंके मूल भगवान् नारायणकी भावपुष्पसे पूजा करता हूँ। मेरे हृदयकमलमें सर्वसाक्षी सच्चिदानन्दस्वरूप भगवान् विष्णु सदा विराजमान रहें—

सकलमुनिभिराद्यश्चिन्त्यते यो हि शुद्धो
निखिलहृदि निविष्टो वेत्ति यः सर्वसाक्षी।
तमजममृतमीशं वासुदेवं नतोऽस्मि
भयमरणविहीनं नित्यमानन्दरूपम्॥
निखिलभुवननाथं शाश्वतं सुप्रसन्नं
त्वतिविमलविशुद्धं निर्गुणं भावपुष्पैः।
सुखमुदितसमस्तं पूजयाम्यात्मभावं
विशतु हृदयपद्मे सर्वसाक्षी चिदात्मा॥
(२३४।६०-६१)

इस प्रकार मैंने आदि-अन्तसे रहित, परात्पर ब्रह्मस्वरूप भगवान् विष्णुके महा प्रभावका वर्णन किया। इसलिये मोक्ष प्राप्त करनेकी इच्छा रखनेवाले मनुष्यको चाहिये कि वह भलीभाँति परमेश्वरका चिन्तन करे। इस संसारमें कौन ऐसा योगी है जो उन बोधगम्य पुराणपुरुष, सूर्यके समान तेजस्वी, विमल, विशुद्धात्मा, श्रेष्ठ, अद्वितीय विष्णुका चिन्तन करके उनमें तदाकार नहीं हो जाता ? जो मनुष्य इस स्तुतिका सदैव पाठ करता है, वह श्रीविष्णुके समान ही प्रशान्तचित्त तथा पापसे रहित हो जाता है। जो व्यक्ति अर्थ, धर्म, काम और मोक्षरूप पुरुषार्थकी कामना करता है अथवा सम्पूर्ण सौख्य चाहता है, वह सब कुछ छोड़कर सर्वश्रेष्ठ पुराणपुरुष, वरण करने योग्य विष्णुकी शरणमें जाता है, इसीलिये उसका प्रभाव सर्वत्र फैल जाता है और वह विष्णुलोकको चला जाता है।

जो प्राणी विभु, सबके स्वामी, विश्वको धारण करनेवाले, विशुद्धात्मा, समस्त संसारके विनाशके हेतु, विमल, भगवान् वासुदेवकी शरणमें अनासक्त-भावसे जाता है, वह मोक्षपदको प्राप्त करता है—

विभुं प्रभुं विश्वधरं विशुद्ध-
मशेषसंसारविनाशहेतुम् ।
यो वासुदेवं विमलं प्रपन्नः
स मोक्षमाप्नोति विमुक्तसङ्गः॥
(२३४।६६)
(अध्याय २३४)