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गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished634 pages

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Page 432
४२२संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

अन्य कोई साधन नहीं है। यह ध्यान पुनर्जन्म देनेवाले कारणोंको भस्म करनेवाली योगाग्नि है। समाधि (ध्यानयोग)-से सम्पन्न योगी योगाग्निसे तत्काल अपने समस्त कर्मोंको नष्ट करके इसी जन्ममें मुक्ति प्राप्त कर लेता है। वायुके सहयोगसे ऊँचे उठनेवाली ज्वालासे युक्त अग्नि जैसे अपने आश्रय कक्ष (कमरे)-को जलाकर भस्म कर देती है, वैसे ही योगी (ध्यानयोगी)-के चित्तमें स्थित श्रीविष्णु योगीके समस्त पापोंको भस्म कर देते हैं। जैसे अग्निके संयोगसे सोना मलरहित हो जाता है, वैसे ही मनुष्योंका मल भगवान् वासुदेवके सांनिध्यसे विनष्ट हो जाता है।

हजारों बार गङ्गास्नान तथा करोड़ों बार पुष्कर नामक तीर्थमें स्नान करनेसे जो पाप नष्ट होता है, वह हरिका मात्र स्मरण करनेसे नष्ट हो जाता है। हजारों प्राणायाम करनेसे जो पाप नष्ट होता है, वही पाप क्षणमात्र भगवान् हरिका ध्यान करनेसे निश्चित ही नष्ट हो जाता है। जिस मनुष्यके हृदयमें भगवान् केशव विराजमान हैं, उसके मानसपर उन दुष्ट उक्तियों तथा पाखण्डका प्रभाव नहीं पड़ता, जो कलिके प्रभावसे प्रवृत्त हैं। जिस समय हरिका स्मरण किया जाता है, वही तिथि, वही दिन, वही रात्रि, वही योग, वही चन्द्रबल और वही लग्न सर्वश्रेष्ठ है। जिस मुहूर्त या क्षणमें वासुदेवका चिन्तन नहीं होता, वह मुहूर्त या क्षण हानिका समय है। वह अत्यन्त व्यर्थ है। वह किसी भी प्रकारके लाभसे रहित होनेके कारण मूर्खता एवं मूकता (गूँगेपन)-का समय है।

जिसके हृदयमें भगवान् गोविन्द विद्यमान हैं, उसके लिये कलियुग भी सत्ययुग ही है। इसके विपरीत जिसके हृदयमें अच्युत भगवान् गोविन्दका वास नहीं है, उसके लिये तो सत्ययुग भी कलियुग ही है। जिसका चित्त आगे और पीछे, चलते तथा बैठते, सदैव भगवान् गोविन्दमें रमा हुआ है, वह व्यक्ति सदा ही कृतकृत्य है—

कलौ कृतयुगं तस्य कलिस्तस्य कृते युगे।
हृदये यस्य गोविन्दो यस्य चेतसि नाच्युतः॥
यस्याग्रतस्तथा पृष्ठे गच्छतस्तिष्ठतोऽपि वा।
गोविन्दे नियतं चेतः कृतकृत्यः सदैव सः॥

<div align="right">(२३०। २३-२४)</div>

हे मैत्रेय! जप, होम एवं पूजा आदिके द्वारा जिसका मन वासुदेव श्रीकृष्णकी आराधनामें अनुरक्त है, उसके लिये इन्द्र आदिका पद विघ्नके समान है।

जिन्होंने श्रीकेशवके चरणोंमें अपने मनको अर्पित कर दिया है, वे गृहस्थाश्रमका परित्याग बिना किये ही, कठिन तपश्चर्या बिना किये ही पौरुषी (पुरुषोत्तम परब्रह्मकी शक्ति) मायाके जालको काट डालते हैं।

गोविन्द दामोदरका हृदयमें वास रहनेपर मनुष्य क्रोधियोंके प्रति क्षमा, मूर्खोके प्रति दया और धर्ममें संलग्न प्राणियोंके प्रति प्रसन्नता प्रकट करते हैं—

क्षमां कुर्वन्ति क्रुद्धेषु दयां मूर्खेषु मानवाः।
मुदं च धर्मशीलेषु गोविन्दे हृदयस्थिते॥

<div align="right">(२३०। २७)</div>

स्नान-दान आदि कर्मोंमें तथा विशेष रूपसे सभी प्रकारके दुष्कर्मोंका प्रायश्चित्त करते समय भगवान् नारायणका ध्यान करना चाहिये।

जिनके हृदयमें नीलकमलके समान सुन्दर श्यामवर्ण भगवान् हरि विराजमान रहते हैं, उन्हींको वास्तविक लाभ और जय प्राप्त होते हैं। उनका पराभव कैसे हो सकता है—

लाभस्तेषां जयस्तेषां कुतस्तेषां पराभवः।
येषामिन्दीवरश्यामो हृदयस्थो जनार्दनः॥

<div align="right">(२३०। २९)</div>

हरिमें समर्पित चित्तवाले कीड़े-मकोड़े, पक्षी आदि जीव-जन्तुओंकी भी ऊर्ध्व (उत्तम) गति