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गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished634 pages

Page 428 of 634

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Page 428

४१८ संक्षिप्त गरुडपुराण [ आचार-


जाते हैं। जिनकी बुद्धिमें भगवान् हरि निवास करते हैं, उनके लिये यज्ञाराधन आदिसे क्या लाभ? भक्तिसे ही नारायणकी आराधना होती है। भक्तिके अतिरिक्त उनकी आराधनाके लिये अन्य कोई साधन नहीं है। विभिन्न प्रकारके दान देनेसे, भलीभाँति पुष्प-समर्पणसे अथवा अनेक प्रकारके दिव्य अनुलेपनसे भी परमात्मा जनार्दन विष्णु उतना संतुष्ट नहीं होते जितना भक्तिसे।

इस संसाररूपी विषवृक्षके अमृतके समान दो फल हैं—पहला फल है—भगवान् केशवकी भक्ति और दूसरा फल है, उनके भक्तोंका सत्संग—

संसारविषवृक्षस्य द्वे फले ह्यमृतोपमे।
कदाचित्केशवे भक्तिस्तद्भक्तैर्वा समागमः॥
(२२७।३२)

सनातन पुरुष श्रीविष्णु एकमात्र भक्तिसे सुलभ हैं और यह भक्ति अनायास पत्र, पुष्प, फल अथवा जलका श्रद्धाके साथ श्रीविष्णुके चरणोंमें समर्पणमात्रसे प्राप्य है। ऐसी स्थितिमें अतिकष्टसाध्य मुक्तिके लिये क्यों प्रयत्न किया जाय?

‘हमारे कुलमें एक विष्णुभक्तने जन्म लिया है, यह हमारा इस संसार-सागरसे उद्धार करेगा।’ यह सोचकर पितृगण ताल ठोकते हैं और पितामह ताली बजा-बजाकर नृत्य करते हैं। अज्ञानी और पापात्मा शिशुपाल तथा सुयोधन आदि भी सुरश्रेष्ठ भगवान्‌की निन्दा-अपमानके ब्याजसे, भगवान्‌का स्मरणमात्र करके निष्पाप हो गये और मुक्तिको प्राप्त कर लिये। ऐसी स्थितिमें भगवान्‌में परमभक्ति रखनेवालोंके मुक्तिलाभमें कौन-सा संशय है? वह तो निस्सन्देह प्राप्त होगी ही—

अज्ञानिनः सुरवरे समधिक्षिपन्तो
यत्पापिनोऽपि शिशुपालसुयोधनाद्याः।
मुक्तिं गताः स्मरणमात्रविधूतपापाः
कः संशयः परमभक्तिमतां जनानाम्॥
(२२७।३५)

ध्यानयोगसे रहित होकर भी जो लोग श्रीविष्णुकी शरणमें आ जाते हैं, वे मृत्युका अतिक्रमण करके परम वैष्णवगतिको प्राप्त हो जाते हैं।

हे माधव! इस संसारमें प्राप्त होनेवाले सैकड़ों कष्टोंसे व्यथित और शरीरमें विद्यमान अनेक इन्द्रिय-छिद्ररूप अश्वोंके साथ विषयवासनाओंमें भटकते हुए इस मेरे मनरूपी घोड़ेको आप रोक लें और अपने चरणरूपी खूँटेमें सुदृढ़ भक्तिरूपी बन्धनसे बाँध दें, जिससे यह मेरा मन आपके चरणकमलका परित्याग कर अन्यत्र न जा सके—

भवोद्भवक्लेशशतैर्हतस्तथा
परिभ्रमन्निन्द्रियरन्ध्रकैर्हयैः।
नियम्यतां माधव मे मनोहय
स्त्वदङ्घ्रिशङ्कौ दृढभक्तिबन्धने॥*
(२२७।३७)

विष्णु ही परमब्रह्म हैं, वे ही तीन भिन्न रूपोंमें वेद-शास्त्रादिके प्रतिपाद्य हैं। इस तथ्यको उनकी मायासे मोहितजन नहीं जानते और जो लोग इस मायासे परे रहते हैं तथा श्रीविष्णुमें अपनी अचल भक्ति रखते हैं, उन्हें यह भेद नहीं दिखायी देता। उनके लिये तो सब विष्णुमय ही होता है। (अध्याय २२७)


* यह श्लोक प्राचीन आप्तपरम्परामें इस प्रकार प्रसिद्ध है—
भवोद्भवक्लेशकशाहताहतः परिभ्रमन्नैन्द्रियकापथान्तरे। निगृह्यतां माधव मे मनोहयस्त्वदङ्घ्रिशङ्कौ दृढभक्तिबन्धनैः॥
इसका अर्थ है—‘हे माधव! मेरा मनरूपी अश्व संसारमें उत्पन्न क्लेशरूपी सैकड़ों कोड़ोंसे आहत होकर ऐन्द्रिय (इन्द्रियसम्बन्धी) अनेक कापथ (कुत्सित मार्गों)-में भटक रहा है। कृपया आप अपने भक्तिरूप दृढ़ बन्धनोंसे अपने चरणरूपी शङ्कुमें इसे बाँधकर निगृहीत कर लें।’
[काशीके प्रसिद्ध परम आस्तिक प्रौढ विद्वान् श्रीरामयशजी त्रिपाठी (महाशयजी) इसी रूपमें इस श्लोकका प्रतिदिन प्रातः पाठ करते थे और कहा करते थे कि यह गरुडपुराणका श्लोक है। विशेषकर वर्तमान कलिकालमें इस श्लोकका पाठ भगवान्‌की भक्ति प्राप्त करनेके लिये अत्यन्त उपयोगी है। यह तथ्य महाशयजीके शिष्य स्व० श्री पं० बालचन्द्र दीक्षितजीसे ज्ञात हुआ है।]