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गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished634 pages

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Page 418
४०८संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

प्राप्त हो जाते हैं। भगवान् विष्णु धर्मस्वरूप ही हैं। पूजा, तर्पण, हवन, संध्या, ध्यान, धारणा आदि जो भी सत्कर्म हैं, वे सब हरि ही हैं।

सूतजीने कहा—हे शौनक ! मैं चारों युगोंके धर्मोंका वर्णन करता हूँ, आप सुनें।

चार हजार युगोंका एक कल्प होता है, इसको ब्रह्माका एक दिन माना गया है। कृतयुग, त्रेता, द्वापर तथा कलि—ये चार युग होते हैं। कृतयुगमें सत्य, दान, तप तथा दया—इन चार पादोंसे धर्म अवस्थित रहता है। धर्मका संरक्षण करनेवाले हरि ही हैं। इस रहस्यको जानकर जो लोग संतुष्ट रहते हैं, वे ही ज्ञानी हैं। सत्ययुग (कृतयुग)-में मनुष्य चार हजार वर्षतक जीवित रहते हैं। सत्ययुगके अन्तमें धर्मपालनकी दृष्टिसे क्षत्रिय उत्कर्षकी स्थितिमें रहते हैं। शूद्रोंकी अपेक्षा ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य धर्मपालनमें उच्च आदर्श प्रस्तुत करते हैं। सर्वाधिक बलशाली एवं शूर भगवान् विष्णु ही राक्षसोंका विनाश करते हैं।

त्रेतायुगमें धर्म सत्य, दान और दया—इन तीन पादोंपर ही अवस्थित रह जाता है। इस कालके मनुष्य यज्ञपरायण होते हैं। सम्पूर्ण संसार क्षत्रियोंसे सुरक्षित रहता है। रक्तवर्णके भगवान् हरि मनुष्योंद्वारा इस युगमें पूजित होते हैं। मनुष्योंकी आयु एक हजार वर्षकी होती है। इस युगमें विष्णु भीमरथ कहलाते हैं और क्षत्रियोंके द्वारा राक्षसोंका संहार होता है।

द्वापरमें धर्मकी मूर्ति दो पादोंपर अवस्थित रहती है। इस युगमें अच्युत भगवान् विष्णु पीतवर्ण धारण करते हैं। लोगोंकी आयु चार सौ वर्षकी होती है। ब्राह्मण और क्षत्रिय-वर्णसे उत्पन्न प्रजासे पृथिवी व्याप्त रहती है। इस युगके लोगोंकी अल्प बुद्धिको देखकर वेदव्यासका रूप धारण कर भगवान् विष्णुने एक ही रूपमें विद्यमान वेदको चार भागोंमें विभक्त किया और अपने समस्त शिष्योंको उन चारों वेदोंका अध्ययन कराया। भगवान् वेदव्यासने ऋग्वेदकी शिक्षा 'पैल' नामक शिष्यको, सामवेदकी शिक्षा 'जैमिनि' नामक शिष्यको, अथर्ववेदकी शिक्षा 'सुमन्तु' नामक शिष्यको और यजुर्वेदकी शिक्षा 'महामुनि वैशम्पायन' नामक शिष्यको प्रदान की तथा वेदाङ्गों और पुराणोंका अध्ययन सूतजीको कराया। इन पुराणोंके एकमात्र वेद्य हरि ही हैं। ये अठारह पुराणोंके रूपमें विभक्त हैं।

सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वन्तर और वंशानुचरित—ये पुराणके पाँच लक्षण हैं। ब्रह्म, पद्म, विष्णु, शिव, भागवत, भविष्यत्, नारदीय, स्कन्द, लिङ्ग, वराह, मार्कण्डेय, अग्नि, ब्रह्मवैवर्त, कूर्म, मत्स्य, गरुड, वायु तथा ब्रह्माण्ड नामक अठारह पुराण प्रसिद्ध हैं। मुनियोंने अनेक उपपुराणोंकी भी बात बतायी है। उनमें सबसे पहला उपपुराण सनत्कुमारके द्वारा कथित है। भगवान् नरसिंहके द्वारा उपदिष्ट एक दूसरा उपपुराण है, जो नरसिंहपुराणके नामसे प्रसिद्ध है। तीसरा उपपुराण स्कन्द है, इसको भगवान् शिवके पुत्र कुमार कार्तिकेयजीने कहा है। चौथा उपपुराण शिवधर्म (शिवधर्मोत्तर) नामक है, जिसे भगवान् नन्दीश्वरने कहा है। महर्षि दुर्वासाद्वारा प्रोक्त आश्चर्य (अद्भुत) पुराण तथा देवर्षि नारदजीद्वारा कथित नारद उपपुराण है। इसी प्रकार कपिल, वामन तथा उशनस् उपपुराण महर्षि कपिल, वामन तथा उशनस्द्वारा उपदिष्ट हैं। इसी प्रकार ब्रह्माण्ड, वारुण, कालिका, माहेश्वर, साम्ब, पराशर, मारीच तथा भार्गव नामक उपपुराण भी हैं। पुराण, धर्मशास्त्र, चारों वेद, शिक्षा, कल्पादि, छः वेदाङ्ग, न्याय, मीमांसा, आयुर्वेद, अर्थशास्त्र, गन्धर्वशास्त्र तथा धनुर्वेदशास्त्र—ये अठारह विद्याएँ हैं—

पुराणं धर्मशास्त्रं च वेदास्त्वंगानि यन्मुने।
न्यायः शौनक मीमांसा आयुर्वेदार्थशास्त्रकम्॥
(२२३।२१)