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गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished634 pages

Page 378 of 634

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Page 378
३६८संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

ऋर्णार्णम्, प्रार्णम्में (वृद्धि), शीतार्तः में (दीर्घ), सैन्द्री-सौकरमें (वृद्धि), बध्वासन, पित्रर्थ, लनुबन्धमें (यण्), नायकः, लवणम्, गावःमें (अयादि), एते (गुण) त ईश्वराःमें (अय् और यलोप्) (ये शब्द स्वरसन्धिके उदाहरण हैं।) देवी गृहमथो अत्र अ अवेहि पटू इमौ (इनमें प्रकृति भाव है।), अश्वाः षडस्य (जश्त्वा), तन्न (अनुनासिक), वाक् (चर्त्व), षड्दलानि (जश्त्वा), तच्चरेत् (श्रुत्व-चर्त्व), तल्लुनाति (परसवर्ण), तज्जलम् (श्रुत्व), तच्छमशानकम् (छत्व-श्रुत्व), सुगण्णण्त्र, पचन्नन्न्र (नुट् आगम), भवांश्छादयति (अनुस्वार सुट्-श्रुत्व), भवाञ्झनकरः (परसवर्ण), भवांस्तरति, (अनुस्वार-सुट्), भवाँल्लिखति (परसवर्ण), ताञ्छक्रे (श्रुत्व), भवाञ्शेते (श्रुत्व) भवाण्डीनं त्वन्तरसि त्वङ्करोषि (परसवर्ण) (ये व्यञ्जनसन्धिके उदाहरण हैं), सदार्चनम् (दीर्घ), कश्चरेत् (श्रुत्व) कृष्टकारेण (ष्टुत्व), कःकुर्यात् कःफले (जिह्वामूलीय विसर्ग) कश्शेते (श्रुत्व), कष्षण्डः (ष्टुत्व), कस्कः (सत्त्व), क इहात्र क एवाहु—र्देवा आहुः, भो व्रज (रुत्व, यत्व, यलोप्), स्वयम्भूविष्णुर्व्रजति (रुत्व) गीष्पतिः (षत्व), धूर्पतिः (रुत्व), कुटीच्छाया (तुक्-श्रुत्व), तथाच्छाया (तुक्-विकल्प)—ये विसर्ग-सन्धिके उदाहरण हैं।

समास छः प्रकारके होते हैं (द्वन्द्व, द्विगु, तत्पुरुष, कर्मधारय, बहुव्रीहि, अव्ययीभाव)। स द्विजः=सद्विज (कर्मधारय), त्रिवेद (त्रयाणां वेदानां समाहारः द्विगु) तत्कृतः तदर्थः वृकभीतिः, यद्धनम् ज्ञानदक्षः (इनमें क्रमशः तेन कृतः, तस्मै अर्थः, वृकाद् भीतिः, यस्य धनम्, ज्ञानेदक्षः इस व्युत्पत्तिसे तृतीया, चतुर्थी, पञ्चमी, षष्ठी तथा सप्तमी तत्पुरुष समास है।) तत्त्वज्ञमें बहुव्रीहि तथा अधिमानमें अव्ययीभाव समास है। देवर्षिमानवाःमें देवश्च ऋषिश्च मानवश्च इस व्युत्पत्तिसे द्वन्द्व समास है।

'पाण्डव (पाण्डोः अपत्यमिति पाण्डवः इत्यर्थे अण्)<sup>१</sup>', शैव (शिवो देवताऽस्य इत्यर्थे अण्)<sup>१</sup>, ब्राह्म्यम् (ब्राह्मणः भावः कर्म इत्यर्थे ष्यञ्)<sup>२</sup>, तथा ब्रह्मता (ब्राह्मणःभावः इत्यर्थे तल्)<sup>३</sup>, आदि तद्धित प्रत्ययान्त शब्द हैं।

देव, अग्नि, सखि, पति, अंश, क्रोष्टा (सियार), स्वायम्भुव, पितृ, नृ, प्रशस्ता (प्रशंसक), रै (धन), गौ और ग्लौ (चन्द्रमा)—ये अत्यन्त पुँल्लिङ्गके सिद्ध शब्द हैं। अश्वयुक् (घोड़ेसे युक्त), क्ष्माभुक् (पृथ्वीका उपभोग करनेवाला राजा), मरुत् (पवन), क्रव्याद, मृगव्यध (मृगका पीछा करनेवाला शिकारी), आत्मन्, राजन् (राजा), यव, पन्था (मार्ग), पूषन् (सूर्य), ब्रह्महन् (ब्राह्मणको मारनेवाला ब्रह्मघाती), हलिन् (हल धारण करनेवाला मनुष्य), विट् (जार पुरुष), वेधस् (विधाता), उशनस् (उशना-शुक्राचार्य), अनड्वान् (गाड़ी खींचनेवाला बैल), मधुलिट् (शहद चाटनेवाला भौंरा) तथा काष्ठतृट् (कठफोर पक्षी या बढ़ई)—ये हलन्त् पुँल्लिङ्गके अन्तर्गत आनेवाले सिद्ध शब्द हैं।

वन (जंगल), वारि (जल), अस्थि (हड्डी), वस्तु (सामग्री), जगत् (संसार), साम्, अहः, कर्म, सर्पिष् (घी), वपुष् (शरीर), तेजस् (ऊर्जा)—ये आदिके चार शब्द अजन्त और शेष हल् प्रत्ययान्त नपुंसकलिंगके सिद्ध रूप हैं।

जाया (पत्नी), जरा (वृद्धावस्था), नदी, लक्ष्मी, श्री, स्त्री, भूमि, वधू, भ्रू (भौंह), पुनर्भू (पुनर्जन्म), धेनु (गौ), स्वसा (बहन), मातृ (माता) तथा नौ


१. शिवादिभ्योऽण् (पा०सू० ४।१।११२)
२. गुणवचनब्राह्मणादिभ्यः कर्मणि च (पा०सू० ५।१।१२४)
३. तस्य भावस्त्वतलौ (पा०सू० ५।१।११९)