गरुड़ पुराण
Garuda Purana
by महर्षि वेदव्यास
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Read in contextकाण्ड ] * औषधियोंके पर्यायवाची नाम * ३६५
त्रिसुगन्धि नामक औषधिका निर्माण दारुचीनी नामक वृक्षकी छाल, इलायची तथा तेजपत्ताको समान मात्रामें मिलानेपर होता है, इसे त्रिजातक कहा जाता है, उसमें नागकेशरका मिश्रण कर देनेपर वह चतुर्जातक कहलाता है। पिप्पली, पिप्पलीमूल, चव्य, चित्रक और नागरके मिश्रित स्वरूपको पञ्चकोल और कोल कहा जाता है।
प्रियंगुको कंगुका (काकुन) तथा कोद्रव या कोदोको कोरदूषके नामसे जानना चाहिये। त्रिपुट्का नाम पुट है और कलापका लङ्कक नाम स्वीकार किया गया है। वेणु अर्थात् बाँसको सतीन तथा वर्तुल भी कहा जाता है।
पिचुक, पित्तल, अक्ष और विडालपदक शब्द तौल-परिमाणमें एक कर्ष (सोलह मासा)-के वाचक हैं। सुवर्ण तथा कवलग्रहका बराबर मान है। पलार्ध अर्थात् आधा पल, एक शुक्ति तथा आठ माषक भारमें समान है। पल,बिल्व और मुष्टिका परिमाण समान होता है। दो पलकी मात्राको प्रसुति अर्थात् एक पसर कहा गया है। अंजलि और कुडवका मान चार पलके बराबर होता है। आठ पलको अष्टमान कहा जाता है, उसे मान भी कहा गया है। चार कुडवका एक प्रस्थ (एक सेर) और चार प्रस्थका एक आढक अर्थात् एक अढैया होता है। इसीको एक काशपात्र कहा गया है। चार आढकका एक द्रोण होता है। एक सौ पलका एक तुला और बीस पलका एक भाग माना गया है। विद्वानोंने प्रस्थ आदिकी मात्रामें प्राप्त होनेवाले द्रव्योंका मान तो इस प्रकारसे कहा है, किंतु द्रव-पदार्थोंकी मात्राको उसका दुगुना स्वीकार किया गया है।
भद्रदारु, देवकाष्ठ तथा दारु देवदारुके वाचक हैं। कुष्ठको आमय और मांसीको नलदंश कहा गया है। शंख नामक औषधिका नाम शुक्तिनख है तथा व्याघ्र नामकी औषधि व्याघ्रनखी या व्याघ्रनख शब्दसे कही गयी है। गुग्गुल नामकी औषधिके वाचक पुर, पलङ्कष तथा महिषाक्ष शब्द हैं। रस गन्ध-रसका पर्यायवाची है, इसीको बोल भी कहा जाता है। सर्ज अर्थात् राल सर्जरसका बोधक है। प्रियङ्गु फलिनी, श्यामा, गौरी और कान्ता—इन नामोंसे अभिहित किया जाता है। करंज या कंजेका नाम नक्तमाल, पूतिक तथा चिरबिल्वक है। शिग्रु शोभाञ्जन तथा रोनमान नामसे प्रसिद्ध है। इसे सहिजन भी कहा जाता है। सिन्धुवार नामक औषधिके वाचक हैं—जया, जयन्ती, शरणी और निर्गुण्डी। मोरटा नामक औषधि पीलुपर्णी (मूर्वा) है तथा तुण्डीका नाम तुण्डिकेरी है।
मदन-वृक्षको गालव बोधा, घोटा और घोटी कहा जाता है। चतुरङ्गुल नामक औषधि सम्पाक तथा व्याधिघातक नामसे भी प्रसिद्ध है। आरग्वधका नाम राजवृक्ष और रैवत है। दन्तीको लोग काकेन्दु, तिक्ता, कण्टकी और विकङ्कत कहते हैं। निम्बको अरिष्ट कहा गया है तथा पटोलका एक नाम कोलका (परवल) है। वयस्थाका नाम विशल्या, छिन्ना और छिन्नरुहा है। गुडूचीके पर्यायवाची हैं—वशा, दन्ती तथा अमृता। किराततिक्तका नाम भूनिम्ब और काण्डतिक्त है।
सूतजीने कहा— हे शौनक ! ये सभी नाम वनमें उत्पन्न होनेवाली औषधियोंके हैं। इन्हीं वनस्पतियोंका वर्णन भगवान् श्रीहरिने शिवजीसे किया था। अब मैं कुमार अर्थात् भगवान् स्कन्दके द्वारा कहे गये व्याकरणशास्त्रको बतलाऊँगा, उसे आप ध्यानपूर्वक सुनें।
(अध्याय २०४)