गरुड़ पुराण
Garuda Purana
by महर्षि वेदव्यास
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Read in contextकाण्ड ] उत्तम तथा अधम अश्वोंके लक्षण, अश्वोंके आगन्तुज और त्रिदोषज रोगोंकी चिकित्सा ३५९
बनाकर यदि घोड़ेको पिलाया जाय तो उसका रक्तस्राव बंद हो जाता है। घोड़ेमें कुष्ठविकार होनेपर तो उसके उपशमनके लिये इसी काढ़ेको तीन दिन देना चाहिये। व्रणयुक्त कुष्ठरोग होनेपर सरसोंका तैल बहुत ही लाभप्रद है। लहसुन आदिका काढ़ा देनेसे उसके खाने-पीनेके दोष दूर हो जाते हैं। बिजौरा नींबूका रस जटामांसीके रसमें मिलाकर नस्य देनेसे तत्काल घोड़ेके वातजनित दोषोंका विनाश होता है।
घोड़ेको प्रथम दिन एक पल औषधीय नस्य देना चाहिये। उसके बाद एक-एक पल प्रतिदिन अधिक बढ़ाते हुए अठारह दिनतक उसका उपयोग करना चाहिये। यह मात्रा उत्तम प्रकारके घोड़ेकी है। मध्यम प्रकारके घोड़ोंकी औषधिकी मात्रा चौदह पल तथा अधम जातिके घोड़ोंकी आठ पल होती है। शरत् और ग्रीष्म-ऋतुमें घोड़ोंको ऐसे विकारोंसे मुक्त करनेके लिये किसी भी प्रकारकी औषधिका नस्य-प्रयोग करना उचित नहीं है। घोड़ेके वातजन्य रोगमें शर्करा, घृत तथा दुग्धसे युक्त तैल, श्लैष्मिक रोगमें त्रिकटुसे युक्त कडुवा तैल और पित्तविकारमें त्रिफलाचूर्ण-समन्वित जलसे नस्य देना चाहिये। साठी चावल और दुग्ध खाने-पीनेवाला घोड़ा अत्यन्त बलशाली होता है। पके हुए जामुनके समान तथा सोनेके सदृश चमकते हुए वर्णवाला अश्व श्रेष्ठ होता है।
भारवाही घोड़ेको आधे-आधे प्रहरपर गुग्गुलका सेवन कराना चाहिये। जो घोड़ा बहुत ही जल्दी थक जानेके कारण रुक जाता हो, उसको खीर या दूध पिलाना चाहिये। वातजनित विकार होनेपर घोड़ेको भोजनमें साठी चावलका भात और दूध देना चाहिये। पित्तविकार होनेपर उसको एक कर्ष अर्थात् दो तोला जटामांसीका रस, मधु, मूँगाका रस और घृतका मिश्रण देनेसे लाभ होता है। कफ-विकार होनेपर मूँग और कुलथी या कडुवा तथा तिक्त भोज्य-पदार्थ देना चाहिये। बधिरता या ग्रासजन्य रोगसे ग्रस्त होनेपर अथवा त्रिदोषजन्य विकारोंके उत्पन्न हो जानेसे दुखित घोड़ेको गुग्गुलकी औषधि देनी चाहिये। सभी प्रकारके रोगोंमें घोड़ेको पहले दिन अन्य प्रकारकी घासोंके साथ एक पल दूर्वा घास देना ही अपेक्षित है। उसके बाद इस मात्राको धीरे-धीरे बढ़ाना चाहिये। एक दिनमें एक कर्ष अर्थात् दो तोला और अधिकतम पाँच पल दिया जा सकता है। सामान्य स्थितिमें घोड़ेके लिये खाने-पीनेके निमित्त अस्सी पल दूर्वाकी मात्रा श्रेष्ठतम मानी गयी है। उसकी मध्यम मात्रा साठ पल और अधम चालीस पल है।
घोड़ेको व्रण-कुष्ठ तथा खञ्ज-विकार (लँगड़ानेका विकार) होनेपर त्रिफलाके क्वाथमें भोजन मिलाकर देना चाहिये। मन्दाग्नि और शोथ-रोग होनेपर उसको गोमूत्रके साथ भोजन देना चाहिये। वात-पित्तजन्य व्रणविकार अथवा अन्य व्याधि होनेपर गोदुग्ध और घृत मिलाकर घोड़ेको भोजन देना लाभकारी है। दुर्बल घोड़ेको मासी नामक औषधिके साथ भोजन देना पुष्टिकारक होता है। शरत् और ग्रीष्म-ऋतुमें घोड़ेको पाँच पल गुडूचीका रस घीमें मिलाकर अथवा दूधमें मिलाकर प्रातःकाल पिलाना चाहिये। यह घोड़ेके रोगोंका विनाश करनेवाली, उनको शक्तिसम्पन्न बनानेवाली और उनके तेजको बढ़ानेवाली है। गुडूची-कल्पके साथ शतावरी और अश्वगन्धा नामक औषधियोंके रसकी मात्रा क्रमशः उत्तम, मध्यम और अधमरूपमें चार पल, तीन पल तथा एक पल निश्चित की गयी है।
यदि घोड़ोंमें अकस्मात् एक ही प्रकारका रोग उत्पन्न हो जाय और उपचार होनेपर भी घोड़ेकी मृत्यु हो जाय तो उसे उपसर्ग (कोई दैवीप्रकोप या महामारी) समझना चाहिये। उसकी शान्तिके लिये