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गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished634 pages

Page 343 of 634

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Page 343

काण्ड ] नेत्र, नाक, मुख, गला, अनिद्रा तथा पादरोग और शस्त्राघातादिजनित रोगोंकी चिकित्सा ३३३

मंजन करनेसे दाँतोंकी कटकटाहट दूर हो जाती है। हे शिव ! कर्कटपादका दूधके साथ लेप करनेसे भी इस रोगका विनाश हो जाता है। ज्योतिष्मती (मालकँगनी)-के फलोंको जलमें पीसकर उसके द्वारा तीन सप्ताहतक कुल्ला करनेसे भी इस रोगमें लाभ होता है। विदारीकन्द और हरीतकीके चूर्णका मंजन करनेसे दाँतोंका कालापन विनष्ट होता है।

लोध्र, कुंकुम, मजीठ, अगर, लालचन्दन, यव, चावल तथा मुलेठीको जलमें पीसकर तैयार किया गया मुखलेप स्त्रियोंके मुखको शोभा-सम्पन्न बनाता है। दो प्रस्थ बकरीका दूध, एक प्रस्थ तिलका तेल, एक-एक कर्ष रक्तचन्दन, मंजिष्ठ, लाक्षा-रस, मधुपष्टी और कुंकुमसे सिद्ध लेपपाक एक सप्ताहके अन्तर्गत ही मुखकी शोभाको बढ़ा देता है।

सोंठ, पिप्पली-चूर्ण, गुडूची और कण्टकारीके क्वाथका पान करनेसे जठराग्नि तीव्र हो जाती है। हे महादेव ! कंजा, पित्तपापड़ा, बृहती (भटकटैया), अदरक, हरीतकी तथा गोखरूके द्वारा सिद्ध क्वाथ पीनेसे थकान दूर हो जाती है एवं दाह, पित्त-ज्वर, शारीरिक शुष्कता और मूर्च्छा-दोष भी विनष्ट हो जाते हैं।

मधु, घृत, पिप्पली-चूर्ण एवं दूधसे युक्त क्वाथका पान हृदयरोग, खाँसी तथा विषमज्वरका विनाशक होता है।

हे वृषध्वज ! सामान्यतः क्वाथ तथा औषधियोंकी अनुपान-मात्रा आधा कर्ष अर्थात् एक तोला है। विशेष रूपसे रोगीकी आयुके अनुसार उसके परिमाणपर विचार करना चाहिये।

गौके गोबरसे रस निकालकर दूधके साथ पान करनेसे विषमज्वर दूर हो जाता है। काकजंघा (घुँघची)-का रस भी इस ज्वरका नाशक है। सोंठके चूर्णसे युक्त बकरीके दूधका क्वाथ विषम ज्वरको दूर कर देता है।

मुलेठी, खस, सेंधा नमक तथा भटकटैयाका फल पीसकर उसका नस्य देनेसे पुरुषको नींद आने लगती है। हे शिव ! काली मिर्चका चूर्ण मिलाकर मधुका नस्य लेनेसे भी प्राणीको नींद आ जाती है। काकजंघा (कालाहिस्रा)-की जड़ मस्तकपर लेप करके भी निद्राको लाया जा सकता है। कांजी तथा धूना नामक वृक्षके गोंदसे सिद्ध तैलपाकको शीतल जलमें मिलाकर सिरपर लेप करनेसे सिर-संताप दूर हो जाता है। यह रक्तदोषज ज्वर और दाहसे उत्पन्न होनेवाले संतापको भी दूर करता है।

शिलाजीत, शैवाल, मन्था (मेथी), सोंठ, पाषाणभेदी (पत्थरचट्टा), सहिजन, गोखरू, वरुण और सौभाञ्जनकी जड़—इन सबको एकत्र करके बनाया गया जल या क्वाथ हींग तथा यवक्षारके सहित पान करनेसे वातरोगका विनाश होता है।

हे शिव ! पिप्पली, पिप्पलीमूल तथा भिलावेका जल या क्वाथ भली प्रकारसे शूलरोगको दूर करनेका श्रेष्ठतम योग है।

अश्वगन्धा तथा मूलीके रससे शोधित वामीकी जो मिट्टी होती है, उसको रगड़नेसे दाद और ऊरुस्तम्भ नामक रोग शान्त हो जाते हैं।

बृहतीमूल अर्थात् भटकटैयाकी जड़को पानीमें पीसकर पीनेसे संघातवात नष्ट होता है। अदरक और तगरकी जड़को पीसकर मट्ठेके साथ पीनेसे झिंझिनी अर्थात् झुंझबाईका रोग वैसे ही नष्ट होता है, जैसे वज्रके प्रभावसे वृक्ष धराशायी हो जाता है।

अस्थिसंहारक हरजोड़ अर्थात् ग्रन्थिमान् नामक लताकी जड़को भातके साथ खानेसे अथवा जटामांसीके रसके साथ पान करनेसे वातरोग तथा अस्थिभंगके दोष विनष्ट हो जाते हैं। बकरीके दूध और घृत-मिश्रित सत्तूका लेप दोनों पैरके तलुओंमें करनेसे जलन समाप्त हो जाती है। मधु, घृत,