गरुड़ पुराण
Garuda Purana
by महर्षि वेदव्यास
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Read in contextकाण्ड ] स्त्रियोंके रोगोंकी चिकित्सा, ग्रहदोषके उपाय, ऋतुचर्या तथा पथ्यकारक सर्वौषधियाँ ३२५
सेंधा नमकको पीसकर पीना विषनाशक है। घृत-मिश्रित सिंहोरकी जड़का क्वाथ पीनेसे भी विष-दोष दूर हो जाता है।
जो औषधि वृद्धावस्थाको दूर करनेका सामर्थ्य रखती है, उसको रसायन<sup>१</sup> कहा जाता है। रसायनकी अभिलाषा करनेवाले लोगोंको वर्षा आदि ऋतुओंमें यथाक्रम सेंधा नमक, शर्करा, सोंठ, पिप्पली, मधु तथा गुड़के साथ हरीतकी नामक औषधिका प्रयोग करना चाहिये अर्थात् वर्षाकालमें सेंधा नमक, शरत्कालमें शर्करा, हेमन्तकालमें सोंठ, शिशिरकालमें पिप्पली, वसन्तकालमें मधु तथा ग्रीष्मकालमें गुड़के साथ हरीतकीका सेवन प्राणियोंके लिये रसायनका कार्य करता है।
ज्वरकी समाप्तिपर व्यक्ति एक हरीतकी, दो बहेड़ा, चार आँवला, मधु और घृतका सेवन करके सौ वर्षतक जीवित रहता है। दूध तथा घृतके साथ अश्वगन्धा नामक औषधि तो प्राणियोंके शरीरमें होनेवाले सभी रोगोंका विनाश करती है। मण्डूकपर्णी और विदारीकन्दका रस अमृतके समान है। मनुष्य तिल, आँवले और भृंगराजके सेवनसे शतायु बन जाता है। त्रिकटु, त्रिफला, चित्रक, गुडूची, शतावरी, विडंग और लौहचूर्ण मधुके साथ मिलाकर खाना सभी रोगोंका विनाशक बन जाता है। त्रिफला, पिप्पली, सोंठ, गुडूची, शतावरी, विडंग तथा भृंगराज आदिका सिद्ध रस भी सभी रोगोंको विनष्ट करनेकी शक्तिसे सम्पन्न होता है। एक भाग शतावरी तथा दस भाग दुग्धसे कल्क बनाकर शर्करा, पिप्पली और मधुसे युक्त घृतपाक अत्यन्त पौष्टिक होता है।
चिकित्सामें प्रतिमर्ष, अवपीड, नस्य, प्रवपन तथा शिरोविरेचन—ये पाँच कर्म कहे जाते हैं। क्रमशः माघ आदि प्रत्येक दो मासकी एक ऋतु होती है। इस प्रकार एक वर्षमें छः ऋतुएँ<sup>३</sup> होती हैं। इन सभी ऋतुओंमें अग्निसेवन, मधु, दूध और दहीके विवर्त आदिका सेवन करना चाहिये। मनुष्यको शिशिर-ऋतुमें स्त्रीके साथ रहना चाहिये। वसन्त-ऋतुमें दिनमें सोना उचित नहीं है। वर्षा-ऋतुमें दिवा-निद्रा तथा शरत्कालमें चन्द्रकिरणोंका सेवन मनुष्यके लिये त्याज्य है।
साठी चावल, मूँगकी दाल, वर्षाका जल, क्वाथ और दूध पथ्य हैं। नीम, अलसी, कुसुम्भ<sup>४</sup>, सहिजन, सरसों, ज्योतिष्मती तथा मूलीका तेल भी प्राणीके लिये पथ्य माना गया है। ये कृमि, कुष्ठ, प्रमेह, वात, श्लेष्मज दोष और सिरमें होनेवाली पीड़ाका नाश करते हैं।
अनार, आँवला, बेर, करौंदा, चिरौंजी, नीबू, नारंगी, आमड़ा और कपित्थ नामक फल भी पथ्य हैं। किंतु ये पित्तवर्धक और अग्निविनाशक हैं तथा इनसे कफजनित दोष होता है। जल, नागरमोथा, इक्षुरस और कुटज मल-मूत्रके अवरोधको दूर करनेमें समर्थ होते हैं।
धामार्गव अर्थात् घिया तरोईको सदैव वमनके रोगमें सेवन करना चाहिये। पूर्वाह्नकालमें वमन करनेके लिये वचके साथ खैर और इन्द्रयवका सेवन लाभप्रद है। पित्तदोष होनेसे प्राणियोंका अन्नादिक कोष्ठ सबल नहीं रह पाता। उनमें एक प्रकारकी मधुरता रहती है। वात और कफदोषका आश्रय मिलनेसे उसमें दोष अधिक ही आ जाते हैं। वात, पित्त और कफ—इन त्रिदोषोंकी समान स्थिति रहनेपर उन कोष्ठोंकी क्षमता मध्यम रह जाती है। (उस स्थितिमें न तो उनकी कार्य-क्षमतामें शिथिलता रहती है और न उनमें दोषोंकी
१-लाभो पाथो हि शस्तानां रसादीनां रसायनम्। (सु० सं० सू० अ० १)
२-च० चि० १। ३-शिशिर, वसन्त, ग्रीष्म, वर्षा, शरद् और हेमन्त। ४-कुसुम्भ (बरें)।