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गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished634 pages

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Page 328

३१८ संक्षिप्त गरुडपुराण [ आचार-

निसोथका चूर्ण घृतके साथ पान करनेके योग्य है, क्योंकि यह उदावर्त-रोगका विनाश करता है। त्रिवृत, हरीतकी और काली तुलसीकी पत्तीका मिश्रित चूर्ण स्नुहीक्षीर अर्थात् सेहुँड़के दूधसे भावित करके उससे बनायी गयी वटीका गोमूत्रके साथ पान करनेसे अनाह-रोग नष्ट हो जाता है। त्र्यूषण (सोंठ, पिप्पली और काली मिर्च), त्रिफला (हरीतकी, आँवला तथा बहेड़ा), धनिया, विडंग, चव्य (गजपिप्पली) तथा चित्रक (चित्ता) नामक औषधियोंके चूर्णको कल्कसे सिद्ध घृत वातगुल्म-रोगका विनाशक है।

दुग्धमें प्रयुक्त सोंठके चूर्णका अनुपान हृदयगत पीड़ाका नाश करता है। काला नमक तथा उसका आधा भाग हरीतकी-चूर्ण घृतमें मिलाकर पान करनेसे भी यह रोग दूर हो जाता है। कणा (पिप्पली), पाषाणभेदी (पथरचट्टा)-के रसमें शिलाजीतका चूर्ण मिलाकर उसको चावलके जल और गुड़के साथ पान करनेसे मूत्रकृच्छ्ररोगी रोग-विमुक्त हो जाता है। गिलोय, सोंठ, आँवला, अश्वगन्धा और त्रिकण्टक (गोखरू)-का अनुपान वातरोगी, शूलग्रस्त तथा मूत्रकृच्छ्रके रोगीको करना चाहिये। शर्करा अथवा मिश्रीके साथ समान भागमें प्रयुक्त यवक्षार सभी प्रकारके कृच्छ्ररोगोंका विनाशक है अथवा मधुके साथ निदिग्धिका (इलायची)-का रस पान करनेसे भी सब प्रकारके कृच्छ्ररोग विनष्ट हो जाते हैं।

त्रिफला-कल्कके साथ प्रयोगमें लाये गये सेंधा नमकको भी मूत्राघातका विनाशक माना गया है। मूत्रमें अवरोध होनेपर कर्पूरका चूर्ण लिंगमें प्रविष्ट करना चाहिये। मधुके साथ प्रयुक्त आँवलेका रस सभी प्रकारके मेहरोगोंको विनष्ट करनेवाला है। त्रिफला, देवदारु, दारुहल्दी और कमलमूलका क्वाथ भी मधुके साथ पान करनेसे वह प्रमेहरोगको दूर करता है।

शरीरकी पुष्टि चाहनेवाले व्यक्तिको अनिद्रा, मैथुन, व्यायाम तथा चिंताका परित्याग कर देना चाहिये। ऐसा करनेसे शरीर धीरे-धीरे पुष्ट होने लगता है। यव और साँवाँ खानेवाला प्राणी स्थूल हो जाता है। मधुके साथ जल पीनेसे भी प्राणीके शरीरमें स्थूलता आ जाती है। उष्ण अन्न अथवा माँडयुक्त चावलका भोजन करनेसे शरीर कृश हो जाता है। गजपिप्पली, जीरा, त्रिकटु, हींग, काला नमक तथा आँवलाचूर्ण-समन्वित सत्तूको मधुके साथ पान करनेसे मेदा-विकारका नाश और अग्निका उद्दीपन होता है।

चौगुने जल और दोगुने गोमूत्रमें चित्रक नामक औषधिका कल्क पाक करके उसके द्वारा उदररोगीको एक प्रस्थ घृत सिद्ध करना चाहिये। तदनन्तर वह दूधके साथ उस घृतका पान करे। ऐसा करनेसे उसकी जठराग्नि उद्दीप्त हो उठती है। अनुपानमें दूधके साथ क्रमशः एक-एक पिप्पलीकी अभिवृद्धि करते हुए रोगी दस दिनतक उसका सेवन करे, पुनः उसी क्रमसे एक-एक पिप्पलीको घटाते हुए बीसवें दिन मात्र एक पिप्पलीका सेवन करे तो उससे भी उस रोगीकी जठराग्नि प्रबल हो जाती है। पुनर्नवाके क्वाथ एवं कल्कसे सिद्ध किया गया घृत शोथ-रोगका विनाश करनेमें समर्थ होता है। शोथ-रोगीको गोमूत्र या गोदुग्धके साथ पिप्पली अथवा गुड़के साथ समान भागमें हरीतकी या सोंठका सेवन करना चाहिये।

मनुष्य बला नामक औषधिके रसमें सिद्ध दूधके साथ एरण्ड-तेलका पान करके आध्मान तथा शूलजनित पीड़ासे युक्त आन्त्रवृद्धिके रोगपर विजय प्राप्त कर सकता है। अग्निशोधित अरुचक अर्थात् एरण्ड-तेलसे सिद्ध पथ्या (हरीतकी)-का कल्क, काला नमक एवं सेंधा नमकसे समन्वित