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गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished634 pages

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Page 326
३१६संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

ग्रहणी जठराग्निको विनष्ट कर देती है। चित्रक अर्थात् चित्ताके द्वारा बने हुए क्वाथ और कल्कके साथ पका हुआ घृत ग्रहणी-रोगका विनाशक है। यह गुल्म, शोथ, उदर, प्लीहा, शूल तथा अर्शरोगको भी नष्ट कर देता है। इसके सेवनसे पेटकी अग्नि प्रदीप्त हो उठती है। सौवर्च (काला नमक), सैन्धव (सेंधा नमक), विडंग (लवण-विशेष), उद्भिद (रेह) और समुद्र-फेन—इन पाँचों लवणोंके समान भागमें मिश्रित चूर्णका प्रयोग करनेसे लाभ होता है।

शस्त्र, क्षार तथा अग्नि इस त्रिविध चिकित्साके द्वारा अर्श-रोगका विनाश होता है। यदि नया तैयार किया हुआ तक्र हो तो उसको भी अर्श-विनाशक ही मानना चाहिये। घीमें भूनी गुडूची, पिप्पली और हरीतकीका चूर्ण अम्ल तथा लवणके साथ रसोतका चूर्ण खानेसे भी यह रोग दूर हो जाता है। तिल और ईखके रसका प्रयोग करनेसे अर्श तथा कुष्ठ-रोगका विनाश होता है। पञ्चकोल (पिप्पली, पिप्पलीमूल, चव्य, चीता तथा सोंठ)-के साथ काली मिर्च और त्र्यूषण (सोंठ, पिप्पली और काली मिर्च)-का चूर्ण अग्निवर्धक है। सोंठ, गुड़ अथवा सेंधा नमकके साथ हरीतकीका चूर्ण निरन्तर खाना चाहिये; क्योंकि यह अग्निवर्धक होती है। त्रिफला, गिलोय, वासक, चिरायता, नीमकी छाल और नीमकी गिरीका क्वाथ मधुके साथ पान करनेसे कामला तथा पाण्डु-रोग समाप्त हो जाता है। त्रिवृत, त्रिफला, श्यामा, पिप्पली, शर्करा और मधुमिश्रित बना मोदक संनिपात-ज्वरका विनाशक तथा रक्त-पित्तज ज्वरको भी नष्ट करता है।

वासक (अडूसाँ)-का रस उदरभागमें पहुँचनेपर जीवनकी आशा बनी रहती है। ऐसी स्थितिमें रक्त और पित्तका क्षय होता है, तब खाँसीके रोगसे व्यथित प्राणी किसलिये दुखित होता है (अर्थात् वासकके रहते खाँसीके रोगीको जीवनसे निराश नहीं होना चाहिये।) शर्करासे युक्त जंगली अडूसा और मृद्धीक^२ रसका बना क्वाथ पथ्य है। इसको मिश्रीके साथ पान करनेसे कास, निःश्वास और रक्तपित्तज दोष विनष्ट हो जाता है। मिश्री अथवा मधुके साथ अडूसेका रस पान करनेसे रोगी रक्तज दोषपर सफलता प्राप्त कर लेता है। शाल्लकी (सलई), बेर, जामुन, प्रियाक, आम, अर्जुन और धव नामक वृक्षकी छालका क्वाथ दूध और मधुके साथ पान करनेसे रक्त-सम्बन्धित रोग दूर हो जाता है। अपने ही रसमें भावित, मूल, फल और पत्रसहित निर्गुण्डीका सिद्ध घृत पान करके क्षय-रोगसे क्षीण हुआ रोगी व्याधिरहित होकर देवताओंके समान कान्तिमान् हो उठता है।

हरीतकी, सोंठ, पिप्पली, काली मिर्च और गुड़ मिलाकर बनाये गये मोदकको कासनाशक कहा गया है। इसको खानेसे तृष्णा एवं अरुचिका भी नाश होता है। कण्टकारी तथा गुडूचीसे पृथक्-पृथक् निकाले गये तीस-तीस पल रसमें सिद्ध किया गया एक प्रस्थ घृत कासरोगका नाश और अग्निका दीपन करता है। कृष्णा (काली पत्तियोंवाली तुलसी), धात्री (आँवला), श्वेत सोंठका चूर्ण मधुके साथ मिलाकर खाना हिक्का (हिचकी)-रोगका विनाशक बन जाता है। जो प्राणी हिचकी और श्वास-रोगके रोगी हैं, उनको विश्वा अर्थात् सोंठके साथ भार्गी (भारंगी)-का रस गरम जलसे पीना चाहिये।

स्वरभेद होनेपर मुखमें तिलके तेलमें सिद्ध खदिर (कत्थे)-का रस रखना लाभप्रद होता है


१-वासायां विद्यमानायामाशायां जीवितस्य च। रक्तपित्ती क्षयी कासी किमर्थमवसीदति॥
२-मृद्धीक—मुनक्का