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गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished634 pages

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Page 319

काण्ड ] वैद्यकशास्त्रकी परिभाषा ३०९

प्रायः कफ, पित्त और वायु जैसा क्रम दिया गया है, वैसे ही शरीरमें ये उद्दीप्त होते हैं। शरीरके शक्तिहीन होनेपर अथवा विशेष वृद्धावस्थाके आ जानेपर रोगी क्षारक्रिया, अग्निचिकित्सा और शल्यकर्म-रहित होता है। कृशकाय रोगीका बृंहण, स्थूल शरीरवाले रोगीका कर्षण और मध्य शरीरवाले रोगीका रक्षण-कार्य करना चाहिये। शरीरके ये ही तीन भेद माने गये हैं। चिकित्सा-कार्यमें इस त्रिविध क्षमताका विवेचन भी अपेक्षित होता है।

स्थिरता, व्यायाम और संतोष-धारण करनेकी प्रवृत्तिसे रोगीके बलको समझना चाहिये। जो मनुष्य विकार-रहित, उत्साह-सम्पन्न तथा महासाहसिक होता है, वह बलवान् माना गया है। जिस प्राणीके खान-पान भी प्रकृतिके विरुद्ध हैं, यदि वे रोगीके शरीरमें आनेवाले कलके सुखकी कल्पनाको साकार करते हैं तो उसको प्रकृतिकी साम्यावस्था कहा जाता है।

कफजन्य पदार्थोंका भक्षण करनेसे गर्भिणी स्त्रीके गर्भसे कफ-रोगसे युक्त संतान ही उत्पन्न होती है। इसी प्रकार वातजनक तथा पित्तोत्पादक पदार्थोंसे भी होता है, किंतु हितैषी भोजन करनेसे समान धातुवाली संतानका जन्म होता है।

कृशकाय, रूक्ष, अल्पकेश, चञ्चलचित्त तथा स्वप्नमें बहुत बोलनेवाला व्यक्ति वात-प्रकृतिवाला होता है। असमयमें ही जिसका बाल सफेद हो गया हो, गौर वर्णवाला, स्वेद एवं क्रोधयुक्त, बुद्धिमान् और स्वप्नमें भी तेज देखनेवाला मनुष्य पित्त-प्रकृतिसे समन्वित कहा गया है। स्थिरचित्त, सूक्ष्मस्वर, प्रसन्न, स्निग्धकेश तथा स्वप्नमें जल और पत्थर देखनेवाला पुरुष कफ-प्रकृतिसे सम्बन्धित होता है। मिश्रित लक्षणोंके होनेपर प्राणीको द्विदोषज तथा त्रिदोषज मानना चाहिये। प्राणीमें उक्त दोषोंका इतर भाव होनेपर जिस दोषके अधिक लक्षण दिखायी देते हों, उसीके अनुसार उसकी प्रकृतिका निर्धारण होता है।

मन्द, तीक्ष्ण, विषम और सम—ये वात-पित्त आदिकी चार अवस्थाएँ हैं। कफ, पित्त तथा वायुकी अधिकता और समतासे जठराग्नि भी भिन्न प्रकारकी हो जाती है। शरीरमें सदैव जठराग्निकी समताकी रक्षा करनी चाहिये। विषम स्थिति आनेपर वातनिग्रह करना चाहिये। तीक्ष्णावस्था होनेपर पित्त-दोषका प्रतीकार और मन्दावस्थामें कफका शोधन आवश्यक माना गया है।

सभी रोगोंकी उत्पत्तिके कारण अजीर्ण और मन्दाग्नि-दोष हैं। आम, अम्ल, रस तथा विष्टम्भ—ये चार उसके लक्षण हैं। आम-दोष होनेपर विषूचिका, हृदयरोग और आलस्यादिके उपद्रव होते हैं। ऐसा विकार होनेपर वच, कटुफल और लवणमिश्रित जलपान कराकर रोगीको वमन कराना चाहिये। अम्ल-दोष होनेपर प्राणीमें शुक्रका अभाव, भ्रम, मूर्च्छा और तृष्णा आदिके दोष जन्म लेते हैं। इस अवस्थामें अग्निपर बिना पकाया हुआ शीतल जल, वायुका सेवन रोगीके लिये अपेक्षित है। रस-दोष होनेपर शरीरभंग, शिरोजाड्य तथा भोजनकी अनिच्छा आदिसे सम्बन्धित उपद्रव होते हैं। इस दोषके होनेपर दिनमें निद्रा और उपवासका परित्याग करना चाहिये। विष्टम्भ-दोष होनेपर शूल, गुल्म, अरुचि और मलमूत्रजनित उपद्रव होते हैं। इस दोषकी वृद्धि होनेपर स्वेदन-क्रिया तथा लवणमिश्रित जलपान करनेका विधान है।

आम, अम्ल और विष्टब्धके लक्षणोंका जन्म क्रमशः—कफ, पित्त तथा वायु-दोषके कारण होता है। विद्वान् व्यक्तिको इन दोषोंके होनेपर हींग, त्रिकटु (शुण्ठी, पिप्पली और मरिच) एवं सेंधा नमकका लेप उदरभागपर करके उसका निवारण करना चाहिये। दिनमें सोनेसे सभी प्रकारके अजीर्ण रोगोंका विनाश होता है। अहितकर अन्नोंका प्रयोग करनेसे शरीरमें उनके रोग-समूहोंकी