गरुड़ पुराण
Garuda Purana
by महर्षि वेदव्यास
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Read in context२९८ संक्षिप्त गरुडपुराण [ आचार-
तदनन्तर जब वह कुष्ठ रक्त और मांसमें प्रविष्ट हो जाता है तो रोगीके शरीरमें स्वेद, ताप तथा शोथके लक्षण उभर आते हैं। रोगीके हाथ और पैरोंमें फोड़े हो जाते हैं। शरीरके संधि-भागोंमें अधिक पीड़ा होती है। दोषाधिक्य होनेपर वह मेदामें पहुँच जाता है, जिसके कारण उसमें उपद्रव होने लगता है। रोगीकी इन्द्रियोंमें संज्ञाशून्यता बढ़ जाती है अर्थात् वह चलने-फिरनेमें अशक्त हो जाता है। रोगीके शरीरकी मज्जा और अस्थिमें जब वह कुष्ठ पहुँच जाता है तो उसके नेत्रोंकी ज्योति तथा वाणीके स्वरोंमें भेद उत्पन्न हो जाता है।
कुष्ठरोगके कृमियोंके द्वारा रोगीके वीर्यमें विकार उत्पन्न हो जानेपर वह दोष स्त्री और संतानके लिये बाधायुक्त हो जाता है। रस-रक्तादि धातुगत कुष्ठोंमें अपने-अपने लक्षणोंके अतिरिक्त यथापूर्व धातुगत कुष्ठोंके लक्षण भी हो जाते हैं।
श्वित्र और कुष्ठ इन दोनों रोगोंकी उत्पत्तिका कारण एक ही है और इनकी चिकित्सा भी एक ही है। इसीको किलास तथा दारुण भी कहते हैं। इनमें अन्तर यही है कि कुष्ठ संनिपातिक है और श्वित्र अलग-अलग दोषोंसे उत्पन्न होता है। कुष्ठ स्रावी है और श्वित्र अपरिस्रावी। कुष्ठ रसादि सातों धातुओंपर आक्रमण करता है और श्वित्र रक्त, मांस तथा मेद—इन तीन धातुओंका आश्रय ग्रहण करता है।
वातज और आभ्यन्तरिक रूक्षताके कारण उत्पन्न हुआ श्वित्र कुष्ठरोग अरुण वर्णका होता है। जब वह पित्तज दोषके कारण जन्म लेता है तो उसका वर्ण पद्मपत्रके समान या ताम्रवत् होता है। यह दाहयुक्त और रोमविनाशक होता है। कफज दोषके कारण उभरा हुआ श्वित्र श्वेतवर्ण, सघन, भारी और खुजलीसे युक्त होता है।
ये श्वित्र क्रमशः रक्त, मांस और मेदामें पहुँचकर आश्रय ग्रहण करते हैं अर्थात् वातज श्वित्र रक्तमें, पित्तज श्वित्र मांसमें तथा कफज श्वित्र मेदमें होता है। अरुण आदि वर्णके आधारपर ही श्वित्रके वातादिक दोष तथा रक्तादि आश्रय—दोनों ही जाने जाते हैं। उत्तरोत्तर इनकी चिकित्सा कष्ट-साध्य होती है अर्थात् यह श्वित्ररोग जबतक रक्ताश्रित होता है, तबतक उसकी चिकित्सा सम्भव है। मांसगत होते ही यह कष्टसाध्य हो जाता है और उसके बाद तो जब यह मेदामें पहुँच जाता है, तब अत्यन्त कष्टसाध्य हो जाता है।
जो श्वित्र कृष्ण वर्णवाले रोमोंसे भरा हुआ होता है, उसके दाग एक-दूसरेसे संश्लिष्ट नहीं होते। वह अधिक समयका न होकर नया ही होता है और उसका जन्म अग्निसे जलनेके कारण नहीं हो तो उसे चिकित्सा-साध्य समझना चाहिये। इन लक्षणोंके विपरीत होनेपर इसका उपचार करना चिकित्सकके लिये त्याज्य है, क्योंकि यह असाध्य हो जाता है। रोगीके गुह्यभाग, करतल और ओष्ठ-प्रदेशमें तो यथाशीघ्र भी उत्पन्न हुआ यह रोग असाध्य बन जाता है। यश प्राप्त करनेके इच्छुक वैद्यको तो किलास नामक श्वित्र-भेदकी चिकित्साको सर्वथा त्याग देना चाहिये, क्योंकि उसका उपचार सम्भव नहीं है।
प्रायः सभी रोग संक्रामक होते हैं। रोगीका स्पर्श करनेसे, उसके साथ बैठकर भोजन करनेसे, उसके साथ रहनेसे, एक शय्या और आसनपर उसके साथ सोने और बैठनेसे तथा उस रोगीके द्वारा प्रयुक्त वस्त्र, माला एवं अनुलेप-पदार्थका प्रयोग करनेसे दूसरे प्राणीमें रोगोंका प्रादुर्भाव हो जाता है।
(अध्याय १६४)