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गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished634 pages

Page 306 of 634

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Page 306

२९६ संक्षिप्त गरुडपुराण [ आचार-

वात-दोषसे कापाल, पित्त-दोषसे उदुम्बर, कफ-दोषसे मण्डल तथा विचर्चिका नामक कुष्ठ उत्पन्न होता है। वातपित्तज दोषसे ऋक्ष, वातश्लेष्मजन्य दोषसे चर्म, एककुष्ठ, किटिम, सिध्म, अलसक तथा विपादिका नामक कुष्ठ होते हैं। श्लेष्मपित्तजन्य दोषसे दद्रु, शतारुषी, पुण्डरीक, विस्फोट, पामा और चर्मदल नामक कुष्ठोंकी उत्पत्ति होती है। इन सभी दोषोंकी संनिपात-अवस्था आनेपर १८ प्रकारके कुष्ठ-रोग उत्पन्न होते हैं।

इनमें पूर्वमें कहे—कापाल, उदुम्बर तथा मण्डल—ये तीन और दद्रु, काकण, पुण्डरीक तथा अरिजिव्हा नामक इन सात कुष्ठोंको महा कुष्ठ माना गया है। शेष ग्यारह क्षुद्र कुष्ठ कहलाते हैं।

कुष्ठरोग* होनेके पूर्व रोगीकी त्वचाओंमें अत्यन्त चिकनाहट, रूक्षता, स्पर्शता, स्वेद, अस्वेद, वर्णभेद, दाह, खुजली, स्पर्शानुभूतिकी कमी, सुई चुभानेसे होनेवाली पीड़ाके समान कष्ट, पित्तीका उछलना और अनायास श्रमकी अनुभूति, रोगीके घावोंमें अत्यधिक पीड़ा, व्रणोंका यथाशीघ्र उद्भव, अधिक समयतक उन व्रणोंका रहना, व्रण-भरावके समय रूक्षता, सामान्य तथा थोड़ेसे कारणपर रोगीको अत्यधिक क्रोध, रोमाञ्च तथा रक्तका काला होना—ये दोषपूर्ण कुलक्षण दिखायी देते हैं।

कापाल कुष्ठका वर्ण काला और लाल होता है अथवा आँवेंमें पकाये गये मिट्टीके खप्परके सदृश वह देखनेमें लगता है। उसमें रूक्षता और कठोरता होती है। इस कुष्ठ-रोगकी आकृति शरीरके अधिक भागमें फैली रहती है। उन स्थानोंमें रहनेवाले रोमसमूह भी दूषित हो जाते हैं। उन दूषित स्थानोंपर सूचिकाभेदनसे होनेवाली पीड़ाके समान अत्यधिक पीड़ा भी होती है। वह कुष्ठ विषम अर्थात् दुःसाध्य माना गया है।

जो कुष्ठरोग उदुम्बर अर्थात् गूलर-फलके समान दिखायी देता हो, उसको औदुम्बर कुष्ठरोग कहना चाहिये। इसकी आकृति वर्तुलाकार होती है। इसमें अत्यधिक गीलापन, दाह और पीड़ा होती है। जिस प्रकार बिना छानी गयी मदिराका वर्ण होता है, जिसमें छोटे-छोटे कीड़े भरे रहते हैं; वैसे ही सामान्य पके हुए उदुम्बरका फल पीत और लाल होता है, उसी रूपमें इस कुष्ठरोगका वर्ण स्वीकार करना चाहिये। इसमें रोगजन्य कृमि रहते हैं, जिसके कारण उस व्रणमें खुजली भी होती है।

जो कुष्ठ स्थिर, गोल, भारी, चिक्कण, श्वेत या रक्त-वर्णवाला और मलसमन्वित हो, उसके वर्ण परस्पर मिले हों, उसमें अत्यधिक खुजलाहट उत्पन्न करनेवाले कृमि हों, उनसे पीब निकलता रहे तथा वह चिकने, पीत वर्णकी आभासे युक्त मण्डलके समान दिखायी देता हो तो उसको मण्डल कुष्ठरोग कहा गया है।

खुजलाहटसे भरी हुई फुंसियोंवाले धूसर वर्णसे युक्त और स्राव-समन्वित कुष्ठका नाम विचर्चिका कुष्ठ है। जो कुष्ठ कर्कश होता है, जिसके किनारेपर लाल वर्ण और बीचमें काला वर्ण विद्यमान रहता है, जिसकी आकृति ऊँची और रीछ अर्थात् भालूकी जिह्वाके समान होती है, जिसमें बहुत-से कृमि भी होते हैं; उसको आयुर्वेदमें ऋष्यजिह्वा या ऋक्षजिह्वा कुष्ठके नामसे अभिहित किया गया है।

हाथीके चमड़ेके समान रोगीका खरखराहट-भरा चमड़ा होनेपर गजचर्मकुष्ठ कहा जाता है। जो कुष्ठ पसीनेसे रहित मछलीके शल्क (अभ्रकवत् चर्म)-के सदृश होता है, उसे एककुष्ठ कहते हैं। जो कुष्ठ रूखा, अग्निके समान वर्णवाला या काला, स्पर्श करनेमें कष्टकारी, खुजलाहटसे युक्त


* सु०नि०अ० ५; च०चि०अ० ५, ७; अ०हृ०नि०अ० १४; वा०नि० ७।