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गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished634 pages

Page 300 of 634

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Page 300
२९०संक्षिप्त गरुड़पुराण[ आचार-

उदररोग-निदान

धन्वन्तरिजीने कहा—हे सुश्रुत! अब मैं उदररोगका निदान कहूँगा, सुनो! मन्दाग्नि होनेपर सभी प्रकारके रोग उत्पन्न होते हैं और उदररोग विशेषकर मन्दाग्निसे ही होते हैं।

उदरमें मल संचित होनेपर अजीर्ण आदि भिन्न-भिन्न रोग, ऊर्ध्व और अधोगति वायुके अवरोध होनेसे सभी प्रवाहिणी नाड़ियाँ अकर्मण्य हो जाती हैं। प्राणवायु अपानादि वायुको दूषितकर उनको मांससंधिमें प्रविष्ट कर देती है। इससे कुक्षिस्थान अवरुद्ध होकर उदररोग उत्पन्न होता है। उदररोग आठ प्रकारके हैं—वातज, पित्तज, कफज, सन्निपातज, सलिलजन्य, प्लीहाजन्य, बद्धोदर-वृद्धि और क्षतजन्य। उदररोग होनेपर हाथ-पैर तथा पेटमें सूजन आ जाती है। शारीरिक चेष्टा, बल और आहार कम हो जाता है। शरीर दुर्बल हो जाता है और अफरा हो जाता है। इस रोगसे ग्रस्त व्यक्तिका आकार प्रेतके समान विकृत हो जाता है।

उदररोगका पूर्व लक्षण भूख-नाश, अरुचि, पाकके समय दाह आदि होता है। ऐसा रोगी अपथ्यका सेवन करता है। उदररोगसे बलक्षय हो जाता है। अतः रोगीके थोड़ा कार्य करनेपर श्वास-प्रश्वासकी वृद्धि हो जाती है। किसी भी विषयमें उसकी बुद्धि प्रवेश नहीं कर पाती और शोक एवं शोथ आदि हो जाते हैं। उदररोगी थोड़ा खानेपर भी वस्तिसंधिमें निरन्तर पीड़ाका अनुभव करता है। सभी प्रकारके उदररोगमें रोगी वृद्धावस्थाके समान जीर्ण हो जाता है और बलहीन हो जाता है। तन्द्रा, आलस्य, मलवेग, मन्दाग्नि, दाह, सूजन और आध्मान—ये सभी जलोदरके लक्षण हैं। सब प्रकारका जलोदररोग मृत्युकारक है। इसलिये उसके लिये शोक करना व्यर्थ है। उदररोगमें रोगीका उदर गवाक्षकी तरह शिरोजालसे व्याप्त हो जाता है और सदा गुड़गुड़ शब्द होने लगता है।

उदररोगमें* वायु नाभि और आँतमें विष्टब्धता उत्पन्न करके नष्ट हो जाता है। वायुजन्य उदररोगमें हृदय, नाभि, कटि, पायु, वंक्षण—इन सभी स्थानोंमें पीड़ा करके स्वयं वायु शान्त हो जाता है। शब्दके साथ वायु निकलने लगता है एवं अल्प परिमाणमें ही मूत्र होता है। उसकी किसी भी विषयमें चञ्चलता नहीं रहती और मुख सदा उदास रहता है। वातोदरमें हाथ-पैर, मुख और कुक्षिमें शोथ हो जाता है। उदर-पार्श्व तथा कटि और पृष्ठ आदि स्थानोंमें पीड़ाका अनुभव होता है और जोड़ोंमें दर्द रहता है। शुष्क कास, शरीरमें पीड़ा, अधोभागमें गुरुता, मलसंग्रह, शरीरमें श्यामवर्णता या अरुणवर्णता आ जाती है एवं मुँहमें बार-बार पानी आता है। पेटमें नीली और काली शिराएँ उभर जाती हैं और व्यथा होती है तथा थपथपानेपर मशक-जैसा शब्द करता है। उदरमें वेदनाके साथ सशब्द वायु चारों तरफ घूमती है। पित्तजनित उदर-रोगमें ज्वर, मूर्च्छा, दाह, प्यास, मुखमें कटुता, अतिसार, त्वचा, नख आदिपर पीलापन, उदरपर हरापन एवं पीली और ताम्रवर्णकी शिराएँ अधिकतासे दीखती हैं तथा ऊष्मा और दाह बना रहता है।

कफजनित उदररोगमें शरीरमें अवसाद, शोथ, भारीपन, निद्राधिक्य, अरुचि, श्वास-कास, त्वचा आदिमें श्वेतता, श्वेत शिराओंसे व्याप्त उदर बड़ा एवं धीरेसे वृद्धिको प्राप्त करता है। त्रिदोषको कुपित करनेवाले आहार-विहारसे, अधिक भोजन करनेसे, शरीरको क्षुब्ध करनेसे, गाड़ी आदिपर यात्रा करनेसे, दौड़ने, कूदने, मैथुन करने, भार उठाने, चलने तथा ज्वरादिसे दुर्बल व्यक्तियोंके


* च०चि०अ० १३ ।