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गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished634 pages

Page 297 of 634

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Page 297

काण्ड ] विद्रधि एवं गुल्म-निदान २८७

बेहोशी तथा जलन आदि उपद्रव होते हैं। कफज विद्रधि तेजीसे उभरता है एवं शीघ्र पक जाता है, पीला हो जाता है और खुजलाहटसे युक्त अरुचि, स्तम्भ रहता है। सन्निपातजन्य विद्रधिमें अधिक क्लेश, शीत, स्तम्भ (जकड़न), जृम्भण (जम्हाई), अरुचि, शरीरका भारीपन आदि सभी लक्षण व्यक्त होते हैं। सन्निपातिक (त्रिदोषजन्य) विद्रधि चिरकालमें उत्पन्न होता है और उसका पाक शीघ्र नहीं होता।

बाह्य और आभ्यन्तरिक विद्रधिमें मल पतला होता है। सन्निपातक विद्रधि कृष्णवर्ण, स्फोटावृत और श्यामवर्णका होता है। उसमें रोगीको अधिक दाह, विद्रधि-स्थानमें पीड़ा और तीव्र ज्वर हो जाता है।

बाह्य विद्रधि प्रायः पित्तज और रक्तज होती है। गर्भाशयगत रक्तज अन्तर-विद्रधि केवल नारियोंको ही होती है। शस्त्र आदिके अभिघातसे अधिक रक्तके बहनेपर यह रोग उत्पन्न हो जाता है। किसी स्थानके कटनेपर वायुके द्वारा परिचालित रक्त पित्तको प्रेरित करता है, जिससे रक्त-पित्त लक्षणवाला विद्रधिरोग उत्पन्न होता है। यह अत्यन्त उपद्रवकारी होता है। स्थान-भेदसे उपद्रवोंका भेद कहा जाता है। नाभिमें विद्रधिरोग होनेपर उसकी धौंकनीकी तरह गति (हिचकी) होती है। वस्ति और मूत्राशय आदिमें विद्रधि होनेपर मूत्र-त्यागमें दुर्गन्ध बहुत तथा क्लेश अधिक होता है। प्लीहा-स्थानमें विद्रधि होनेपर श्वास-प्रश्वासका रोध हो जाता है और अत्यन्त प्यास लगती है। क्लोम-स्थानमें विद्रधि उत्पन्न होनेपर गलेका रोधतृषा होने लगती है। हृदयमें विद्रधि होनेपर सर्वाङ्गमें वेदना होती है। मोह, तमक, श्वास, काससे हृदयकी शून्यताका बोध होता है। कुक्षि और पार्श्वके आभ्यन्तरमें विद्रधि उत्पन्न होनेपर कुक्षिमें अनेक प्रकारके दोष उत्पन्न हो जाते हैं तथा ऊरु, संधि, धड़, वंक्षण, कटि, पीठ, बगल तथा नितम्ब—इन स्थानोंमें विद्रधिके उत्पन्न होनेपर अपानवायु-अवरोध होकर अत्यन्त वेदना होने लगती है। विद्रधिके कच्चे होनेपर, पक जानेपर अथवा सूजनके आधारपर आगेकी स्थितिका निर्देश करना चाहिये। आन्तर विद्रधि यदि नाभिसे ऊपर ऊर्ध्वमुख है तो मवाद एवं रक्तका स्राव मुखसे होता है और नाभिके नीचे होनेपर गुदामार्गसे स्राव होता है तथा नाभिमें होनेपर दोनों ओरसे होता है। उच्च विद्रधिमें दोष क्लेदके समान जानना चाहिये। सन्निपातज विद्रधि अपने स्थानमें अनेक प्रकारके विवर्तको उत्पन्न कर देता है। नाभि और वस्तिमें स्थित विद्रधि अन्तर्गत या बाह्यगत किसी भी प्रकारका हो, वह निश्चित ही पककर फटता है। उसका परिपाक विद्रधि बढ़नेपर होता है, यह विद्रधि क्षीण होनेपर भी अनेक प्रकारके उपद्रवको जन्म देती है। दुष्ट स्वभाववाली एवं पापिनी स्त्रीकी गर्भगत संतान यदि नष्ट हो जाती है तो गर्भमें अधिक सूजन उत्पन्न होता है। स्त्रियोंके स्तनमें जो विद्रधि होती है, वह अतिशय दुःखप्रद होती है। यह बाह्य विद्रधिका लक्षण है। कन्याओंकी नाड़ियाँ अतिशय सूक्ष्म होनेके कारण उन्हें यह स्तनविद्रधि रोग नहीं होता है। यह अपानवायुकी* गतिरोध होनेपर क्रुद्ध वायु लिंगमूलमें शोथ उत्पन्न करता है तथा मुष्क एवं वंक्षणगत फलकोशतक जानेवाली फलकोटकी शिराओंको पीड़ितकर उसमें वृद्धि करता है। इससे मेदामें दोष उत्पन्न होता है। यह वृद्धिरोग है, जो सात प्रकारका होता है—वातज, पित्तज, कफज, रक्तज, मेदज, मूत्रज और आन्त्रज। वातज वृद्धिरोगमें मूत्र वातपूर्ण, कठोर स्पर्शवाला


* वा०नि० ११, अ०हृ०नि०अ० ११।