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गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished634 pages

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Page 281

कांड ] मदात्यय-निदान २७१

होता है और मुखसे अम्लयुक्त फेन निकला करता है।

पित्तज तृषारोगमें रोगीके मुखमें तिक्तता बनी रहती है और मूर्च्छाका भी प्रकोप होता है। रोगीके नेत्र रक्तवर्णके हो जाते हैं। उसके मुखमें निरन्तर शुष्कता बनी रहती है। शरीरमें दाह रहता है और मुँहसे अत्यन्त धूमायित वायु छूटती है।

कफज तृषारोगमें वायु प्रकुपित हो उठती है। उसके कुप्रभावसे अन्तःस्थ स्रोत कफयुक्त हो जाता है और उसके बाद वह उसमें पंकवत् सूख जाता है। उसका कण्ठभाग काँटोंसे चुभते हुएके समान व्यथित होता है। रोगीमें निद्रा छायी रहती है और उसका मुख सदैव मधुर (मीठा) बना रहता है। ऐसा रोगी पेट फूलने, सिरपीड़ा, जडता, शुष्कता, वमन, अरुचि, आलस्य तथा अग्निमान्द्यके दोषसे युक्त होता है।

जिस तृषारोगमें तीनों दोषोंके मिले हुए लक्षण पाये जाते हैं, वह त्रिदोषसे उत्पन्न होती है। इस रोगमें आँवकी उत्पत्तिके कारण रक्तवाही स्रोतका अवरोध होता है। जिसके कुप्रभावसे वात-पित्तका दोष शरीरमें उत्पन्न हो जाता है। उससे रोगीके शरीरमें उष्णता बढ़ जाती है, जिसके कारण शीतल जल प्राप्त करनेकी अभिलाषिणी तृष्णाका प्रादुर्भाव होता है अर्थात् रोगी इस कालमें प्याससे बेचैन हो उठता है। उसी उष्णताके कारण शरीरमें प्रविष्ट हुआ जल जब ऊपरी कोष्ठमें जाता है, तब उसे पित्तजा नामक तृष्णाकी उत्पत्ति होती है। अत्यधिक जल पीनेसे जो तृष्णा शान्त नहीं होती, अपितु तीव्रगतिसे बढ़ती ही जाती है, वह शरीरके स्निग्ध अंशको जला देनेवाली होती है। उसको स्नेहपाकजा अथवा पित्तजा नामकी तृष्णा कहा गया है।

स्निग्ध, कटु, अम्ल तथा लवणरससंश्लिष्ट भोजन करनेसे कफोद्भव तृष्णाका जन्म होता है। जब तृष्णा शरीरके रसको विनष्ट करनेवाले उपर्युक्त लक्षणसे समन्वित हो जाती है, तब वह क्षयात्मिका तृष्णा कहलाती है। जो शोष-मोह-ज्वर आदि अन्य दीर्घकालतक रहनेवाले रोगोंके कारण शरीरमें तीव्र तृष्णा उत्पन्न होती है, उसे उपसर्गात्मिका तृष्णाके नामसे स्वीकार किया गया है।

(अध्याय १५४)


मदात्यय-निदान

धन्वन्तरिजीने कहा—हे सुश्रुत! अब मैं प्राचीन मुनियोंके द्वारा प्रतिपादित मदाधिक्यके निदानको कहता हूँ।

मद्य, तीक्ष्ण, उष्ण, रूक्ष, सूक्ष्म, अम्ल, व्यवायी, आशुकारी, लघु, विकाशी तथा विशद होता है। ओज इसके विपरीत होता है अर्थात् ओज मन्द, शीत, मधुर, सान्द्र, स्निग्ध, स्थूल, चिरकारी, गुरु और पिच्छल होता है। तीक्ष्णादि दस गुण मद्यमें होता है और यही गुण विषमें भी होते हैं, जो प्राणियोंके चित्तमें हलचल मचानेवाले तथा प्राणघातक होते हैं। प्रथम मदमें मद्य अपने तीक्ष्णादि दस गुणोंसे ओजके मन्दादि दस गुणोंको संक्षुभित करके चित्तमें विकार उत्पन्न कर देता है। दूसरा मद प्रमादका स्थान है।<sup>२</sup> इसमें दुष्ट विकल्पोंसे उपहत मनुष्य कर्तव्याकर्तव्यसे अज्ञान होकर मद्यके द्वितीय वेगको अधिक सुखकर मानता है। रजोगुणी या तमोगुणी मनुष्य मध्यम और उत्तमकी संधि अर्थात् द्वितीय और तृतीय मदकी मध्यावस्थामें पहुँचकर अंकुशरहित मदोन्मत्त निरंकुश हाथीकी तरह कुछ भी नहीं करता। यह मद्यावस्था निन्दनीय


१-च०चि० २२, सु०उ०तं० अ० ४८, अ०हृ०जि०अ० ५। २-च०चि०अ० २४, १२, अ०हृ०नि०अ० ६।