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गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished634 pages

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२६संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

(चार सौ बत्तीस) आहुतियाँ उसी विष्णु-मन्त्रसे प्रदान करे।

विद्वान् देशिकको सबसे पहले भगवान्‌का ध्यान करना चाहिये। तदनन्तर वे वायवी कला (यं बीज-मन्त्र)-से शिष्योंकी स्थिति, आग्नेय कला (रं बीज-मन्त्रके)-द्वारा उनकी मनस्ताप-वेदना तथा वारुण कला (वं बीज-मन्त्र)-से हृदयकी स्थिति (धर्मकी अभिरुचि)-का विचार करें। इसके बाद देशिकको उस परम तेजमें आत्मतेजका निक्षेप करके जीवात्मा और परमात्माके ऐक्य अर्थात् अभेद-ज्ञानका चिन्तन करना चाहिये। तदनन्तर वे आकाश-तत्त्वमें 'ॐकार' का ध्यानकर शरीरमें स्थित अन्य कारणभूत वायु, अग्नि, जल तथा पृथिवी-तत्त्वका चिन्तन करें। इस प्रकार प्रणव (ॐकार)-मन्त्रका चिन्तन करते हुए प्रत्येक कारणभूत तत्त्वोंपर जो साधक विजय प्राप्त करता है, वह शरीरधारी होनेके कारण उस पञ्चमहाभूतके ज्ञानरूपी शरीरको ग्रहण कर लेता है। अतः हे वृषभध्वज! अपने अन्तःकरणमें उस सूक्ष्म शरीरधारी (क्षेत्रज्ञ) ज्ञानको उत्पन्न करके प्रत्येक महाभूतको उसीमें संयुक्त करनेका प्रयत्न करना चाहिये।

मण्डलादिके निर्माणमें जो लोग असमर्थ हैं, वे मात्र मानसमण्डलकी कल्पना करके भगवान् श्रीहरिका पूजन करें। [शरीरमें ब्रह्मतीर्थादिकी कल्पना की गयी है। अतएव] उसी क्रमसे वह (मानस-मण्डल भी) चार द्वारोंसे युक्त है। हाथको पद्म तथा अँगुलियोंको पद्मपत्र कहा गया है। हथेली उस पद्मकी कर्णिका है और नख उसके केशर हैं, इसलिये साधकको उस हाथरूपी कमलमें सूर्य, चन्द्र, इन्द्र, अग्नि तथा यमसहित श्रीहरिका ध्यान करके उनकी पूजा करनी चाहिये।

उसके बाद वह देशिक सावधान होकर अपने उस हाथको शिष्यके सिरपर रखे, [क्योंकि हाथमें विष्णु विद्यमान रहते हैं, अतः] यह हाथ स्वयं विष्णु-स्वरूप है। उस हाथके स्पर्शमात्रसे शिष्यके समस्त पाप विनष्ट हो जाते हैं। तदनन्तर गुरु शिष्यकी विधिवत् पूजा करे और उस शिष्यका नामकरण करे।

श्रीहरिने (रुद्रसे) कहा— [अब मैं] सिद्धि प्राप्त करनेके लिये स्थण्डिल आदिमें की जानेवाली श्रीलक्ष्मीकी पूजाके सम्बन्धमें कह रहा हूँ। सबसे पहले—ॐ श्रीं ह्रीं महालक्ष्म्यै नमः—यह कहकर साधक—'श्रां श्रीं श्रूं श्रैं श्रौं श्रः'—इन बीजमन्त्रोंसे क्रमशः हृदय, सिर, शिखा, कवच, नेत्र और अस्त्रमें* इस प्रकारसे षडङ्गन्यास करे—

'ॐ श्रां हृदयाय नमः। ॐ श्रीं शिरसे स्वाहा। ॐ श्रूं शिखायै वषट्। ॐ श्रैं कवचाय हुम्। ॐ श्रौं नेत्रत्रयाय वौषट्। ॐ श्रः अस्त्राय फट्।'

साधनारत भक्तको अङ्गन्यास करके आसनसहित श्रीमहालक्ष्मीकी पूजा करनी चाहिये।

इसके बाद चार प्रकारके वर्णोंसे अनुरञ्जित पद्मगर्भ चार द्वार और चौंसठ प्रकोष्ठोंसे युक्त मण्डलके मध्य लक्ष्मी और उनके अङ्गोंका तथा एक कोणमें दुर्गा, गण एवं गुरुका, तदनन्तर अभीष्ट सिद्धि प्राप्त करनेके लिये तत्पर साधक अग्नि आदि कोणोंमें क्षेत्रपाल देवोंकी पूजा करके हवन करे। तत्पश्चात् वह—'ॐ घं टं डं हं श्रीमहालक्ष्म्यै नमः'—इस महामन्त्रसे पूर्व उल्लिखित परिवारके सहित श्रीमहालक्ष्मीदेवीका पूजन करे।

तदनन्तर उस साधकको 'ॐ सौं सरस्वत्यै नमः।' 'ॐ ह्रीं सौं सरस्वत्यै नमः।' 'ॐ ह्रीं वद वद वाग्वादिनि स्वाहा।', 'ॐ ह्रीं सरस्वत्यै नमः'—इन मन्त्रोंको कहकर सरस्वतीको नमस्कार करना चाहिये।

(अध्याय ७—१०)


* समस्त शरीरकी रक्षक आवरक शक्ति 'अस्त्र' की कल्पना दोनों हाथोंमें की जाती है।

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