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गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished634 pages

Page 278 of 634

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Page 278
२६८संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

जाती है तथा मुखसे दुर्गन्ध आने लगती है।

इस राजयक्ष्माके रोगमें वायुप्रकोपके कारण रोगीके शिरोभाग तथा दोनों पार्श्वमें शूल उठता है, जिसके कारण असह्य पीड़ा होती है। दर्दसे रोगीका अङ्ग-अङ्ग टूटता रहता है, कण्ठावरोध और स्वरभंग हो जाता है। पित्तदोष होनेसे रोगीको स्कन्ध-प्रदेश, हाथ तथा पैरमें दाह, अतिसार, रक्तसंश्रित वमन, मुखदुर्गन्ध, ज्वर और एक प्रकारका मद रहता है। कफजन्य दोषके कारण रोगीको अरुचि, वमन, खाँसी, आधे शरीरका भारीपन, लारबाहुल्य, पीनस, श्वास, स्वरभेद और अग्निमान्द्यका प्रकोप होता है। इसी अग्निमान्द्यता एवं शरीरमें शोथको उत्पन्न करनेवाले प्रदूषित कफजन्य दोषोंसे रोगीके रक्तवाही आदि स्रोतोंके मुखोंका अवरोध तथा धातुओंके क्षीण हो जानेपर हृदयमें दाह और अन्य उपद्रव होते हैं।

शरीरके अंदर पक्वाशय-भागमें उक्त दोषोंके कारण प्रायः अन्न आम्लिक रससे पकता है, जिसके कारण वह सिद्ध नहीं होता और न तो शारीरिक पुष्टतामें सहयोग करनेकी क्षमता ही अर्जित कर पाता है। रोगीके शरीरका ऐसा आम्लिक रस रक्त और मांसको पुष्ट करनेमें अक्षम होता है। सप्तधातुओंका पोषण न होनेपर रोगी केवल मलके भरोसे जीता है।

रोगीमें इन लक्षणोंके कम होनेपर भी अत्यन्त क्षीणता आ सकती है। इस रोगमें छः प्रकारका क्षय होता है। अतः उन सभी प्रकारोंके क्षय होनेपर रोगीके शरीरमें होनेवाले उपद्रवोंको यथोपचार रोककर यथासम्भव इस रोगको समूल दूर करनेका प्रयास करना चाहिये अन्यथा इस रोगसे प्राणीकी मृत्यु ही निश्चित होती है।

उक्त रोगके दोष पृथक्-पृथक् या समूहवत् शरीरपर प्रकट होते ही रोगीके मेदका क्षय हो जाता है, जिसके कारण उसके स्वरोंमें भेद, क्षीणता, रूक्षता और चञ्चलता आ जाती है। वात-प्रकोप होनेसे रोगीका कण्ठ सफेद रंगका हो जाता है। उसके शरीरकी स्निग्धता तथा उष्णता समाप्त हो जाती है। पित्तदोषके कारण रोगीके तालु और कण्ठमें दाह होता है और निरन्तर वह सूखता जाता है। रोगीका मुँह और कण्ठ कफसे संलिप्त रहता है। उसके गलेसे घुरघुराती हुई ध्वनि निकलती है। उस कालमें रोगी स्वयंमें सभी विरुद्ध आचरणोंसे प्रभावित हो उठता है। अतः वह उसकी ओर उन्मुख हो जाता है, जिससे अन्य सभी लक्षणोंकी उत्पत्ति हो जाती है। इससे रोगी मृत्युको ही प्राप्त होता है। वैसी स्थितिमें रोगीको सब ओर धुएँके समान ही दिखायी देता है और सभी कफजन्य लक्षण उसमें प्रकट हो उठते हैं।

इस क्षयरोगसे बचना बड़ा ही कष्टसाध्य है। यदि सभी लक्षणोंसे युक्त होकर यह प्राणीपर आक्रमण करता है तो रोगीकी जीवनरक्षा असम्भव हो जाती है। अतः अल्प लक्षणोंके दिखायी देते ही इस रोगको शरीरसे दूर करनेहेतु विधिवत् चिकित्सा करनी चाहिये। (अध्याय १५२)


अरोचक, वमन आदि रोगोंका निदान

धन्वन्तरिजीने कहा— हे सुश्रुत ! अब मैं आपको अरोचकरोगके निदानके विषयमें बताऊँगा। जब वात-पित्त तथा कफजन्य दोष जिह्वा और हृदय या मनका आश्रय लेते हैं, तब प्राणीके शरीरमें अरोचकरोग उत्पन्न होता है।

यह रोग वातजन्य, पित्तजन्य तथा कफजन्य—


१-च०चि०अ० १६, अ०हृ०नि०अ० ५। २-च०चि०अ० ८, सु०उ०तं०अ० ५७।