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गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished634 pages

Page 262 of 634

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Page 262
२५२संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

आयुर्वेद-प्रकरण

[गरुडपुराणका आयुर्वेद-प्रकरण अत्यन्त महत्त्वका है। इस प्रकरणके प्रथम बीस अध्यायोंमें निदान-स्थानके विषय वर्णित हैं। किस कारणसे रोग उत्पन्न हुआ है और रोगके लक्षण क्या हैं जिससे रोगका निर्णय हो सके इत्यादि विषय 'निदान' शब्दसे अभिप्रेत हैं। इसके बाद लगभग चालीस अध्यायोंमें रोगोंकी चिकित्सा-हेतु औषधियोंका निरूपण हुआ है तथा उन औषधियोंके निर्माणकी विधि बतायी गयी है। इस औषधिका यह अनुपान है, किस प्रकार इसका सेवन करना चाहिये आदि बताया गया है। एक ही रोगके लिये अनेक औषधिक योगोंको भी बताया गया है, पर यह सब किसी सुयोग्य वैद्यके परामर्शसे ही करना उचित है।

उपलब्ध गरुडपुराणका पाठ कहीं-कहीं अस्पष्ट तथा खण्डित भी प्रतीत होता है। आयुर्वेदके आर्षग्रन्थोंका आश्रय करके यथासम्भव अर्थ ठीक करनेकी चेष्टा की गयी है, पाठकोंको इससे लाभ उठाना चाहिये—सम्पादक]

निदानका अर्थ तथा रोगोंका सामान्य निदान-निरूपण

धन्वन्तरिजीने कहा— हे सुश्रुत! प्राचीन कालमें आत्रेय आदि श्रेष्ठ मुनियोंने जिस प्रकार सभी रोगोंका निदान बताया है, वैसे ही मैं तुम्हें सुनाऊँगा। पाप्मा, ज्वर, व्याधि, विकार, दुःख, आमय, यक्ष्मा, आतङ्क, गद और आबाध—ये पर्यायवाची शब्द हैं।

रोगके ज्ञानके पाँच उपाय हैं—निदान, पूर्वरूप, रूप, उपशय और सम्प्राप्ति। निमित्त, हेतु, आयतन, प्रत्यय, उत्थान तथा कारण—इन पर्यायोंसे निदान कहा जाता है अर्थात् निमित्त आदि शब्दोंसे जिस वस्तुका निश्चय होता है वही निदान है। दोष-विशेषके ज्ञानके बिना ही उत्पन्न होनेवाला रोग जिन लक्षणोंसे जाना जाता है, उसे पूर्वरूप कहते हैं। यह पूर्वरूप सामान्य और विशिष्ट-भेदसे दो प्रकारका होता है। यह उत्पद्यमान रोग जिन लक्षणोंसे जाना जाता है, उन लक्षणोंको अल्पताके कारण थोड़ा व्यक्त होनेसे पूर्वरूप कहा जाता है। वही पूर्वरूप व्यक्त हो जानेपर रूप कहलाता है। संस्थान, व्यञ्जन, लिङ्ग, लक्षण, चिह्न और आकृति—ये रूपके पर्यायवाची शब्द हैं। हेतु-विपरीत, व्याधि-विपरीत, हेतु-व्याधि-उभय-विपरीत तथा हेतु-विपरीत अर्थकारी (हेतुके समान प्रतीत होनेपर भी विपरीत क्रिया करनेवाला), व्याधि-विपरीत अर्थकारी और हेतु-व्याधि-उभय-विपरीत अर्थकारी औषध, अन्न तथा विहारके परिणाममें सुखदायक उपयोगको उपशय कहते हैं, इसीका नाम सात्म्य भी है। उपशयके विपरीत अनुपशय होता है। इसका दूसरा नाम व्याध्यसात्म्य भी है। दोष जिस प्रकार (प्राकृत आदि विविध) निदानोंसे दूषित होकर (ऊर्ध्व आदि भिन्न गतियोंके द्वारा शरीरमें) विसर्पण करते हुए (धातु आदिको दूषित कर) रोगको उत्पन्न करता है, उसे सम्प्राप्ति कहा जाता है। उसके पर्यायवाची शब्द हैं—जाति तथा आगति।

संख्या, विकल्प, प्राधान्य, बल और व्याधि कालकी विशेषताओंके आधारपर उस सम्प्राप्तिके भेद किये जाते हैं। जैसे इसी शास्त्रमें बताया जायगा कि ज्वरके आठ भेद होते हैं (यह संख्यासम्प्राप्ति हुई)। रोगोत्पत्तिमें कारणभूत दोषोंकी अंशांशकल्पना (न्यूनाधिक्य आदि)-का विवेचन विकल्पसम्प्राप्ति, स्वतन्त्रता और परतन्त्रताद्वारा दोषोंका प्राधान्य या अप्राधान्य-विवेचन प्राधान्यसम्प्राप्ति, हेतु-पूर्वरूप और रूपकी सम्पूर्णता अथवा अल्पताके द्वारा बल या अबलका विवेचन बलसम्प्राप्ति और दोषानुसार रात्रि, दिन, ऋतु एवं भोजन (-के परिपाक)-के अंश (आदि, मध्य और अन्त)-द्वारा रोगकालके ज्ञानको कालसम्प्राप्ति समझना चाहिये।

इस प्रकार निदानके सामान्य अभिधेयों (निदान, पूर्वरूप, रूप, उपशय और सम्प्राप्ति)-का निरूपण किया गया। सम्प्रति उनका विस्तारसे वर्णन किया