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गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished634 pages

Page 239 of 634

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Page 239
काण्ड ]प्रतिपदा, तृतीया, चतुर्थी तथा पञ्चमीमें किये जानेवाले विविध तिथिव्रत२२९

ॐ महाकर्णाय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि तन्नो दन्तिः प्रचोदयात्।

करन्यासके पश्चात् इसी मन्त्रसे उनका ध्यान करके व्रतीको तिलादिसे उनकी पूजा करके आहुति देनी चाहिये। गणपतिके साथ रहनेवाले गणोंकी पूजा भी करनी चाहिये। व्रतीको 'ॐ गणाय नमः', 'ॐ गणपतये नमः' तथा 'ॐ कूष्माण्डकाय नमः' इस प्रकार कहकर उनकी पूजा करनी चाहिये। उसके बाद स्वाहान्त शब्दका प्रयोग कर इन्हीं मन्त्रोंसे आहुति दे। इसी प्रकार अमोघोल्क, एकदन्त, त्रिपुरान्तकरूप, श्यामदन्त, विकरालास्य, आह्वेष और पद्मदंष्ट्र गणोंको भी 'नमः' और अन्तमें 'स्वाहा' शब्दसे यथापेक्षित नमन और आहुति प्रदान करनी चाहिये। उसके बाद व्रती गणदेवके लिये मुद्रा-प्रदर्शन, नृत्य, हस्तताल तथा हास्यभाव प्रदर्शित करे। ऐसा करनेसे उसे सौभाग्यादि फलोंकी प्राप्ति होती है।

मार्गशीर्षमासके शुक्लपक्षकी चतुर्थी तिथिमें गणकी पूजा करनी चाहिये। वर्षपर्यन्त ऐसा करनेसे विद्या, लक्ष्मी, कीर्ति, आयु और संतानकी प्राप्ति होती है। सोमवार, चतुर्थी तिथिको उपवास रखकर व्रतीको विधि-विधानसे गणपतिदेवकी पूजा कर उनका जप, हवन और स्मरण करना चाहिये। इस व्रतको करनेसे उसे विद्या, स्वर्ग तथा मोक्ष प्राप्त होता है।

शुक्लपक्षकी चतुर्थीको खांडके लड्डू और मोदकसे विघ्नेश्वरकी पूजा करनेपर व्रतीकी समस्त कामनाओंकी सिद्धि तथा सौभाग्यकी प्राप्ति होती है। यदि दमनक (श्वेतकमल)-से इनकी पूजा होती है तो साधकको पुत्रादिकका फल प्राप्त होता है, इसीलिये इस चतुर्थीका नाम दमना है।

'ॐ गणपतये नमः' इस मन्त्रसे गणपतिकी पूजा करनी चाहिये। जिस किसी भी मासमें इन गणपतिदेवकी पूजा करने तथा होम, जप और स्मरण करनेसे व्रतीकी सभी इच्छाएँ पूर्ण हो जाती हैं तथा समस्त विघ्नोंका विनाश हो जाता है। मनुष्यको विभिन्न नामोंका उच्चारण करके भी भगवान् आद्यदेव विनायककी पूजा करनी चाहिये। ऐसा करनेसे उसको भी सद्गतिकी प्राप्ति होती है। जबतक वह इस लोकमें रहता है, तबतक समस्त सुखोंका उपभोग करता है और अन्त समयमें उसे स्वर्ग और मोक्षकी भी प्राप्ति होती है। विनायकके निम्नलिखित ये बारह नाम हैं—

गणपूज्यो वक्रतुण्ड एकदंष्ट्री त्रियम्बकः।
नीलग्रीवो लम्बोदरो विकटो विघ्नराजकः॥
धूम्रवर्णो भालचन्द्रो दशमस्तु विनायकः।
गणपतिर्हस्तिमुखो द्वादशारे यजेद्गणम्॥

<div style="text-align: right;">(१२९। २५-२६)</div>

गणपूज्य, वक्रतुण्ड, एकदंष्ट्र, त्रियम्बक (त्र्यम्बक), नीलग्रीव, लम्बोदर, विकट, विघ्नराज, धूम्रवर्ण, भालचन्द्र, विनायक और हस्तिमुख—इन बारह नामोंसे गणदेवकी पूजा करनी चाहिये।

पृथक्-पृथक् इन नामोंसे जो बुद्धिमान् प्राणी इनकी पूजा करता है, उसकी सम्पूर्ण कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं।

श्रावण, भाद्रपद, आश्विन और कार्तिकमासके शुक्लपक्षकी पञ्चमी तिथिमें वासुकि, तक्षक, कालीय, मणिभद्रक, ऐरावत, धृतराष्ट्र, कर्कोटक तथा धनञ्जय—इन आठ नागोंकी घृतादिसे स्नान कराकर पूजा करनी चाहिये। ये नाग अपने भक्तको आयु-आरोग्य और स्वर्ग प्रदान करते हैं। अनन्त, वासुकि, शंख, पद्म, कम्बल, कर्कोटक, धृतराष्ट्र, शंखक, कालीय, तक्षक और पिंगल—इन नागोंकी पूजा प्रत्येक मासमें करनी चाहिये। भाद्रपदमासके शुक्लपक्षमें आठों नागोंकी पूजा करनेसे साधकको मृत्युके पश्चात् स्वर्ग और मोक्षकी प्राप्ति होती है।