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गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished634 pages

Page 225 of 634

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Page 225

काण्ड ] नीतिसार २१५


हो वहाँ भी निवास करना अच्छा नहीं होता।

कौमार्य-अवस्थामें स्त्रीकी रक्षा पिता करता है, युवावस्थामें उसकी रक्षाका भार पतिपर होता है, वृद्धावस्थामें उसकी रक्षाका भार पुत्र उठाता है। स्त्री स्वतन्त्र रहने योग्य नहीं है।<sup>१</sup>

अर्थके लिये आतुर मनुष्यका न कोई मित्र है और न कोई बन्धु। कामातुर व्यक्तिके लिये न भय है और न लज्जा ही। चिन्तासे ग्रस्त प्राणीके लिये न सुख है और न नींद ही तथा भूखसे पीड़ित मनुष्यके शरीरमें न बल ही रहता है और न तेज ही रह जाता है—

अर्थातुराणां न सुहृन्न बन्धुः
कामातुराणां न भयं न लज्जा।
चिन्तातुराणां न सुखं न निद्रा
क्षुधातुराणां न बलं न तेजः॥
(११५।६७)

दरिद्र तथा दूसरेके द्वारा प्रेषित दूत, पर-नारीमें आसक्त तथा दूसरेके धन-अपहरणमें लगे हुए व्यक्तिको नींद कहाँ आती है?<sup>२</sup> जो मनुष्य ऋणरहित और रोगमुक्त होता है, वही सुखपूर्वक निद्राका उपभोग करता है। इनके अतिरिक्त वह व्यक्ति भी निद्राका सुख प्राप्त करनेमें सफल होता है, जो स्त्रियोंके संसर्गसे दूर रहता है।

जलके परिमाणके अनुसार ही कमलनाल भी ऊपरकी ओर उठता जाता है और अपने स्वामीके बलके अनुसार भृत्य भी गर्वोन्नत हो जाता है। अपने स्थान जलाशयमें स्थित रहनेपर वरुणदेव एवं सूर्यनारायण कमलके साथ मैत्रीपूर्ण व्यवहार करते हैं, किंतु उस स्थानसे च्युत होनेपर उसी कमलके साथ वे जलासक्त और शोषणका व्यवहार करके कष्ट पहुँचाते हैं। पदासीन रहनेपर जो जिसके मित्र होते हैं, वे पदसे विमुक्त होनेपर वैसे ही शत्रु हो जाते हैं जैसे जलमें कमलके विद्यमान रहनेपर सूर्यकी प्रीति उसके साथ रहती है, किंतु उस जलसे उसको तोड़कर स्थलभागमें लानेपर वही सूर्य उसका शोषण करने लगता है।

अपने स्थान या पदपर अवस्थित रहनेपर ही मनुष्यकी पूजा होती है। स्थान और पदसे च्युत होनेपर उसकी उसी प्रकार पूजा नहीं होती, जिस प्रकार शरीरसे पृथक् होनेपर केश, दाँत और नख शोभित नहीं होते—

स्थानस्थितानि पूज्यन्ते पूज्यन्ते च पदे स्थिताः।
स्थानभ्रष्टा न पूज्यन्ते केशा दन्ता नखा नराः॥
(११५।७३)

आचारको देखकर कुलका ज्ञान होता है। भाषाको सुनकर देशका ज्ञान होता है। सम्भ्रमसे स्नेह प्रकट होता है और शरीरको देखकर भोजनका ज्ञान (अनुमान) होता है।<sup>३</sup>

समुद्रमें वर्षा होना व्यर्थ है। तृप्त हुए प्राणीके लिये भोजनका आग्रह व्यर्थ है। समृद्धको दान देना व्यर्थ है तथा नीचके लिये किया गया सुकृत व्यर्थ है। जो प्राणी जिसके हृदयमें अवस्थित है, वह दूरदेशमें रहते हुए भी उसके संनिकट ही विद्यमान रहता है और जो प्राणी हृदयसे ही निकल चुका है, वह समीपमें ही रहते हुए भी दूरदेशमें निवास करनेवालेके समान है।<sup>४</sup>

मुखकी विकृति, स्वरभंग, दैन्यभाव, पसीनेसे लथपथ शरीर तथा अत्यन्त भयके चिह्न प्राणीमें मृत्युके समय उपस्थित होते हैं, किंतु ये ही चिह्न याचकके जीवित शरीरपर भी दिखायी देते रहते हैं।


१-पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने। पुत्रस्तु स्थविरे काले न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति॥ (११५।६३)
२-कुतो निद्रा दरिद्रस्य परप्रेष्यवरस्य च। परनारीप्रसक्तस्य परद्रव्यहरस्य च॥ (११५।६८)
३-आचारः कुलमाख्याति देशमाख्याति भाषितम्। सम्भ्रमः स्नेहमाख्याति वपुराख्याति भोजनम्॥ (११५।७४)
४-दूरस्थोऽपि समीपस्थो यो यस्य हृदये स्थितः। हृदयादपि निष्क्रान्तः समीपस्थोऽपि दूरतः॥ (११५।७६)