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गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished634 pages

Page 221 of 634

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Page 221

काण्ड ] \hfill नीतिसार \hfill २११


कुशासनमें जीवित रहना सम्भव नहीं है। दूसरेका अन्न, दूसरेका धन, दूसरेकी शय्या, दूसरेकी स्त्रीका सेवन और दूसरेके घरमें निवास करना—ये सब कृत्य इन्द्रके भी ऐश्वर्यको समाप्त कर देते हैं।<sup>१</sup>

पापी पुरुषसे वार्तालाप करनेसे, उसके शरीरको स्पर्श करनेसे, संसर्गसे, सहभोजनसे, एक आसनपर बैठनेसे, एक शय्यापर शयन करनेसे एवं एक यानसे गमन करनेपर पापीका पाप दूसरे पुरुषमें संक्रमण कर जाता है। स्त्रियाँ रूपसे नष्ट हो जाती हैं। क्रोधसे तपस्या विनष्ट हो जाती है। दूरतक भ्रमण करनेसे गायें नष्ट हो जाती हैं और शूद्रान्नसे श्रेष्ठ ब्राह्मण नष्ट हो जाता है।<sup>२</sup>

पापीके साथ एक आसनपर बैठनेसे, एक शय्यापर शयन करनेसे, पंक्तिमें एक साथ भोजन करनेसे मनुष्यमें पापका संक्रमण वैसे ही होता है जैसे एक घड़ेका जल दूसरे घड़ेमें प्रविष्ट हो जाता है।

दुलारमें बहुत-से दोष हैं और ताड़नामें बहुत-से गुण हैं। अतः शिष्य एवं पुत्रको अनुशासित रखना चाहिये, उन्हें केवल दुलार देना उचित नहीं है।

अधिक पैदल चलना प्राणियोंके लिये बुढ़ापा है। पर्वतोंका जल उसकी वृद्धावस्था है। सम्भोगकी अप्राप्ति स्त्रियोंके लिये वृद्धावस्था है और सदैव धूपमें रहना वस्त्रोंकी जीर्णता है।

नीच व्यक्ति दूसरेसे कलहकी इच्छा करते हैं। मध्यममार्गी दूसरेसे संधि चाहते हैं तथा उत्तम प्रकृतिके व्यक्ति दूसरेसे सम्मानकी अभिलाषा रखते हैं; क्योंकि महापुरुषोंका धन मान ही है। मान ही अर्थका मूल है। यदि सम्मान है तो धनकी क्या आवश्यकता है? मान और दर्पके नष्ट हो जानेपर धनसे और जीवनसे मनुष्यको क्या लाभ? मान तथा स्वाभिमानके विनष्ट हो जानेके पश्चात् प्राणीको धन एवं आयुसे क्या लेना-देना रह जाता है?

नीच प्रकृतिवाले पुरुष धन चाहते हैं। मध्यम प्रकृतिवाले धन और मानकी अभिरुचि रखते हैं तथा उत्तम प्रकृतिवाले मात्र सम्मानकी इच्छा करते हैं; क्योंकि श्रेष्ठजनोंका मान ही धन है—

अधमा धनमिच्छन्ति धनमानौ हि मध्यमाः।
उत्तमा मानमिच्छन्ति मानो हि महतां धनम्॥
(११५।१३)

वनमें भूखे सिंह किसी दूसरेके द्वारा प्राप्त किये गये मांसको देखनेके लिये भी नहीं झुकते हैं। उत्तम कुलमें उत्पन्न व्यक्ति धनहीन होनेपर भी नीच कर्म नहीं करते। वनमें सिंहका अभिषेक नहीं होता है और न तो उसका कोई संस्कार ही होता है, किंतु नित्य सम्यक् पुरुषार्थको करनेसे प्राणीमें स्वयं ही सिंहत्वका भाव आ जाता है—

नाभिषेको न संस्कारः सिंहस्य क्रियते वने।
नित्यमूर्जितसत्त्वस्य स्वयमेव मृगेन्द्रता॥
(११५।१५)

प्रमादी वणिक्, अभिमानी भृत्य, विलासी भिक्षु, निर्धन कामी तथा कटुभाषिणी वेश्या अपने कार्यमें असफल रहते हैं। दरिद्र होकर दाता होना, धनवान् होनेपर कृपण रहना, पुत्रका आज्ञाकारी न होना और दुष्टजनोंकी सेवामें संलग्न होना तथा दूसरेका अहित करते हुए मृत्युको प्राप्त हो जाना—ये पाँच कर्म मानवके दुश्चरित हैं। पत्नी-वियोग, स्वजनोंके द्वारा अपमान, शेष ऋण, दुर्जनसेवा तथा दरिद्रताके कारण मित्रोंकी विमुखता—ये पाँच बातें मनुष्यको बिना अग्निके ही जलाती हैं।<sup>३</sup>


१-परान्नं च परस्वं च परशय्याः परस्त्रियः। परवेश्मनि वासश्च शक्रादपि हरेच्छ्रियम्॥ (११५।५)
२-स्त्रियो नश्यन्ति रूपेण तपः क्रोधेन नश्यति। गावो दूरप्रचारेण शूद्रान्नेन द्विजोत्तमः॥ (११५।७)
३-दाता दरिद्रः कृपणोऽर्थयुक्तः पुत्रोऽविधेयः कुजनस्य सेवा। परोपकारेषु नरस्य मृत्युः प्रजायते दुश्चरितानि पञ्च॥
कान्तावियोगः स्वजनापमानं ऋणस्य शेषः कुजनस्य सेवा। दारिद्र्यभावाद्विमुखाश्च मित्रा विनाग्निना पञ्च दहन्ति तीव्राः॥
(११५।१७-१८)