Skip to content
SarvaKosh
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

Report a copyright issue

DevanagariHindipublished634 pages

Page 205 of 634

Read in context
Page 205

काण्ड ] नीतिसार १९५


धर्म समझना चाहिये<sup>१</sup>।
आकार, संकेत, गति, चेष्टा, वाणी, नेत्र और मुखकी भावभंगिमासे प्राणीके अन्तःकरणमें छिपा हुआ भाव प्रकट होता रहता है<sup>२</sup>। विद्वान् वह है जो दूसरेके द्वारा अकथित विषयको भी जान लेता है। बुद्धि वह है जो दूसरोंके संकेतमात्रसे भी वास्तविकताको समझ ले। कथित शब्दका अर्थ तो पशु भी जान लेते हैं। मनुष्यके दिखाये गये मार्गका अनुसरण तो हाथी और घोड़े भी करते हैं।
(अध्याय १०९)


नीतिसार

श्रीसूतजीने कहा—जो व्यक्ति सुनिश्चित अर्थका परित्याग कर अनिश्चित पदार्थोंका सेवन करता है, उसका सुनिश्चित अर्थ विनष्ट हो जाता है और अनिश्चित पदार्थ तो नष्ट होता ही है—
यो ध्रुवाणि परित्यज्य ह्यध्रुवाणि निषेवते।
ध्रुवाणि तस्य नश्यन्ति ह्यध्रुवं नष्टमेव च॥
(११०।१)

वाग्वैभवसे रहित व्यक्तिकी विद्या और कायर पुरुषके हाथमें विद्यमान अस्त्र वैसे ही उन्हें संतुष्टि नहीं प्रदान करते, जैसे अपने अंधे पतिके साथ रहती हुई उसकी स्त्री अपने रूप-लावण्यसे पतिको संतृप्त नहीं कर पाती।

सुन्दर भोज्य पदार्थ भी उपलब्ध हो और भोजनकी शक्ति भी हो, रूपवती स्त्री भी हो और सहवास करनेकी क्षमता भी हो तथा धन-वैभव भी हो और दान करनेकी सामर्थ्य भी हो—ये अल्प तपके फल नहीं हैं।

वेदोंका फल अग्निहोत्र है, विद्याका फल शील और सदाचार है, स्त्रीका फल रति और पुत्रवान् होना है तथा धनका फल है दान और भोग।

विद्वान् व्यक्तिको श्रेष्ठ कुलमें उत्पन्न कुरूप कन्याके साथ भी विवाह कर लेना चाहिये, किंतु रूपवती एवं अच्छे लक्षणोंवाली उत्तम कुलसे हीन कन्या उसके लिये कभी भी ग्राह्य नहीं है। मनुष्यको उस अर्थसे क्या लाभ है, जिस अर्थका साथ अनर्थसे होता है? क्योंकि कोई व्यक्ति सर्पके फणपर विद्यमान मणिको प्राप्त करना नहीं चाहता।

अग्निहोत्रके लिये हविष्यान्न दुष्ट कुलसे भी ग्राह्य है। बालकसे भी सुभाषित ग्रहण करना उचित है। अमेध्य अर्थात् अपवित्र स्थानसे स्वर्ण और हीन कुलसे स्त्रीरूपी रत्न भी मनुष्यके लिये संग्राह्य है। विषसे अमृत ग्राह्य है, अपवित्र स्थलसे भी स्वर्ण ग्राह्य है तथा नीच व्यक्तिसे श्रेष्ठ विद्या भी ग्रहण करने योग्य है और दुष्कुलसे भी स्त्री-रत्न ग्राह्य है।

राजाके साथ मित्रभाव और सर्पका विषहीन होना सम्भव नहीं है। वह कुल पवित्र नहीं रहता, जिस कुलमें स्त्रियाँ ही उत्पन्न होती हैं। अपने कुलके साथ भगवद्भक्तका सम्पर्क कर देना चाहिये, पुत्रको विद्याध्ययनमें लगाना चाहिये, शत्रुको व्यसनमें जोड़ देना चाहिये तथा जो अपने इष्टपुरुष हैं, उन्हें धर्ममें नियोजित करना चाहिये।

विद्वान् मनुष्यको नौकर और आभूषणोंको यथोचित स्थानपर नियुक्त करना चाहिये, क्योंकि चूड़ामणि कभी चरणमें सुशोभित नहीं होती है। चूड़ामणि, समुद्र, अग्नि, घण्टा, अखण्ड अम्बर और राजा—ये सिरपर धारण करने योग्य होते हैं अर्थात् आदरणीय हैं। प्रमादवश भी इन्हें चरणमें स्थान नहीं देना चाहिये। मनस्वी व्यक्तिकी पुष्प-स्तबकके


१-तर्कोऽप्रतिष्ठा श्रुतयो विभिन्नाः नासावृषिर्यस्य मतं न भिन्नम्।
धर्मस्य तत्त्वं निहितं गुहायां महाजनो येन गतः स पन्थाः॥ (१०९।५१)
२-अकारैरिङ्गितैर्गत्या चेष्टया भाषितेन च। नेत्रवक्त्रविकाराभ्यां लक्ष्यतेऽन्तर्गतं मनः॥ (१०९।५२)