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गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished634 pages

Page 202 of 634

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Page 202

१९२ संक्षिप्त गरुडपुराण [ आचार-

संतुष्ट किया जा सकता है। सद्भाव रखनेसे देवगण, सज्जनवृन्द एवं द्विजाति संतुष्ट होते हैं। इनके अतिरिक्त साधारण लोग खान-पान तथा पण्डितजन मान-सम्मानसे संतुष्ट हो जाते हैं—

लुब्धमर्थप्रदानेन श्लाघ्यमञ्जलिकर्मणा।
मूर्खं छन्दानुवृत्त्या च याथातथ्येन पण्डितम्॥
सद्भावेन हि तुष्यन्ति देवाः सत्पुरुषा द्विजाः।
इतरे खाद्यपानेन मानदानेन पण्डिताः॥
(१०९।१०-११)

प्रणिपात-निवेदनसे उत्तम प्रकृतिवाले सज्जन पुरुषको, भेद-नीतिसे धूर्त तथा अपनी अपेक्षा कम पराक्रमवाले व्यक्तिको थोड़ा-बहुत देकर और अपने समान पराक्रमवालेको अपनी अपेक्षाके अनुकूल धन देकर वशमें किया जा सकता है। जिसका जैसा स्वभाव हो, उसके अनुरूप वैसा ही प्रिय वचन बोलते हुए उसके हृदयमें प्रवेशकर चतुर व्यक्तिको यथाशीघ्र उसे अपना बना लेना चाहिये।

नदी, नख तथा शृंग धारण करनेवाले पशु, हाथमें शस्त्र धारण किये हुए पुरुष, स्त्री और राजपरिवार विश्वास करनेयोग्य नहीं होते। जो मनुष्य बुद्धिमान् है, उसको अपनी धनक्षति, मनस्ताप, घरमें हुए दुश्चरित्र, वञ्चना तथा अपमानकी घटनाको दूसरेके समक्ष प्रकाशित नहीं करना चाहिये—

नदीनां च नखीनां च शृङ्गिणां शस्त्रपाणिनाम्।
विश्वासो नैव कर्तव्यः स्त्रीषु राजकुलेषु च॥
अर्थनाशं मनस्तापं गृहे दुश्चरितानि च।
वञ्चनं चापमानं च मतिमान् न प्रकाशयेत्॥
(१०९।१४-१५)

नीच और दुर्जन व्यक्तिका सांनिध्य, अत्यन्त विरह तथा सम्मान, दूसरेके प्रति स्नेह एवं दूसरेके घरमें निवास—ये सभी नारीके उत्तम शीलको नष्ट करनेवाले हैं।

किसके कुलमें दोष नहीं है, रोगसे कौन पीडित नहीं है, कौन दुःखी नहीं है और किसकी धन-सम्पत्तियाँ सदैव विद्यमान रही हैं? इस पृथिवीपर धन प्राप्त कर कौन अहंकारसे भरा नहीं है, किसपर विपत्तियाँ आयी नहीं हैं, स्त्रियोंके द्वारा किसका मन क्षुब्ध नहीं किया गया है और राजाओंका कौन प्रिय रहा है? कौन कालकवलित नहीं हुआ है, किस याचकका स्वाभिमान नष्ट नहीं हुआ है, कौन दुर्जनके जालमें फँसकर कुशलपूर्वक जीवनयापन कर सकता है? (अर्थात् कोई नहीं कर सकता।)

जिस मनुष्यके मित्र, स्वजन, बन्धु-बान्धव नहीं हैं, जिसके पास अपनी बुद्धि नहीं है, वह कैसे अपने जीवनमें सफल हो सकता है और जिस कर्मके सम्पन्न होनेपर भी फलका उदय नहीं दीख रहा है, उस कर्मके अनुष्ठानसे क्या लाभ? ऐसे ही जो सम्पत्ति परिणाममें बहुत बड़ा दुःख देनेवाली है, उसका संग्रह कौन बुद्धिमान् व्यक्ति करेगा?

जिस देशमें व्यक्तिको सम्मान न मिले, आदर भी न मिले, अपने बन्धु-बान्धव भी सुलभ न हों और विद्या-लाभकी भी सम्भावना न बनती हो, उस देशका परित्याग कर देना चाहिये।

जिस धनके लिये राजा और चोरसे भय नहीं है, जो धन मरनेपर भी मनुष्यका साथ नहीं छोड़ता, उस धनका उपार्जन करना चाहिये। प्राणोंको भी संकटमें डाल देनेवाले परिश्रमसे जिस धनका अर्जन किया जाता है, उस धनको तो उत्तराधिकारी


१-कस्य दोषः कुले नास्ति व्याधिना को न पीडितः। केन न व्यसनं प्राप्तं श्रियः कस्य निरन्तराः॥
कोऽर्थं प्राप्य न गर्वितो भुवि नरः कस्यापदो नागताः स्त्रीभिः कस्य न खण्डितं भुवि मनः को नाम राज्ञां प्रियः।
कः कालस्य न गोचरान्तरगतः कोऽर्थी गतो गौरवं को वा दुर्जनवागुरानिपतितः क्षेमेण यातः पुमान्॥(१०९।१७-१८)