गरुड़ पुराण
Garuda Purana
by महर्षि वेदव्यास
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Read in context| १६८ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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बार-बार बिजली चमकनेपर, दो प्रहरतक बार-बार मेघ-गर्जन होनेपर, भोजन करनेके बाद हाथ गीला रहनेपर, जलके मध्यमें, अर्धरात्रिमें तथा मध्यके दो प्रहरमें और आँधी-तूफानके बीच भी उतने कालतक अध्ययन नहीं होना चाहिये। दिग्<sup>१</sup>दाह होनेपर, उत्पात-जैसी धूलिकी वर्षा होनेपर, संध्याकालीन कोहरा होनेपर अथवा चोर, राजा आदिके कारण होनेवाले उपद्रवोंके समयमें तत्काल अनध्याय होता है। स्वयं दौड़ते हुए, अपवित्र मदिरा आदिका गन्ध आनेपर तथा शिष्ट व्यक्तिके घर आ जानेपर अध्ययन करना वर्जित है। गधा, ऊँट, वाहन (रथ), हाथी, घोड़ा, नौका, वृक्ष और पर्वतारोहणका काल अनध्यायका ही काल होता है। उपर्युक्त सैंतीस अनध्यायोंको तात्कालिक अनध्याय माना गया है अर्थात् ये निमित्त जिस समय हों, उस समय अनध्याय समझना चाहिये।
देवताकी मूर्ति, ऋत्विक्, स्नातक, आचार्य एवं राजाकी छाया, पर-स्त्रीकी छाया, रक्त, विष्ठा, मूत्र, थूक और उबटनकी सामग्रीका अतिक्रमण नहीं करना चाहिये। बहुश्रुत ब्राह्मण, सर्प, क्षत्रिय (नृपति)-की अवमानना कदापि न करे। ऐसे ही अपनी भी अवमानना न करे। उच्छिष्ट (जूठन), विष्ठा, मूत्र और चरण-प्रक्षालित जल दूरसे ही त्यागने योग्य हैं। श्रुति और स्मृतिमें कहे गये सदाचारका पालन करना चाहिये। किसीके गोपनीय रहस्यको प्रकाशित कर उसे कष्ट नहीं पहुँचाना चाहिये। किसीकी निन्दा या ताड़ना नहीं करनी चाहिये, किंतु पुत्र अथवा शिष्यको दण्ड देना चाहिये। मनुष्यको सर्वदा धर्मका ही आचरण करना चाहिये। धर्मविरुद्ध आचरण उसके लिये त्याज्य है। गृहस्थ व्यक्तिको माता-पिता, अतिथि और धनी पुरुषके साथ विवाद नहीं करना चाहिये।
दूसरेके सरोवरमेंसे पाँच पिण्ड मिट्टी बिना निकाले उसमें स्नान नहीं करना चाहिये। नदी, झरना, देव-सरोवर और पोखर-तालाबमें स्नान करना चाहिये।
दूसरेकी शय्यापर शयन नहीं करना चाहिये। अनापत्तिकालमें परान्न भोजन नहीं करना चाहिये। कृपण, बन्दी, चोर, अग्निहोत्र न करनेवाले ब्राह्मण, बाँसका काम करनेवाले, न्यायालयमें जिसका दोष सिद्ध हो चुका है, सूदखोर, वेश्या, सामूहिक दीक्षा देनेवाला, चिकित्सक, रोगी, क्रोधी, नपुंसक, रंगमंचसे जीविका चलानेवाला, उग्र, निर्दय, पतित, व्रात्य, दम्भी, उच्छिष्टभोजी, शस्त्र-विक्रेता, स्त्रीके वशमें रहनेवाला, ग्राम्य-याजक (ग्रामके देवताओंकी शान्तिके लिये अनुष्ठान करनेवाला), निर्दयी राजा, धोबी, कृतघ्न, कसाई, चुगलखोर, झूठ बोलनेवाला, सोम-विक्रेता, वन्दी तथा स्वर्णकार—इनका अन्न कदापि नहीं खाना चाहिये। बाल तथा कृमि (कीड़े) आदिसे युक्त भोजन एवं मांस नहीं खाना चाहिये।
बासी, उच्छिष्ट, शुक्त (पका हुआ वह अन्न जो अधिक काल बीतनेके कारण विकृत हो गया है), कुत्तेद्वारा स्पृष्ट, पतितद्वारा देखा हुआ, रजस्वलासे स्पृष्ट, संधुष्ट<sup>२</sup> तथा पर्यायान्न<sup>३</sup>-भोजन त्याज्य है। गायसे सूँघा गया, पक्षियोंके द्वारा उच्छिष्ट और जानकर पैरसे छुआ गया अन्न भी त्यागने योग्य होता है। यद्यपि शूद्रका अन्न नहीं लेना चाहिये,
१-दिग्दाह—दिशाएँ यदि जलती हुई प्रतीत होती हों।
२-संधुष्ट—'भोजन बचा हुआ है, जो भोजन करना चाहे वह आकर ले ले'। इस प्रकारकी घोषणा करके जो भोजन दिया जाता है, वह 'संधुष्ट' कहा जाता है।
३-पर्यायान्न—किसी दूसरेके उद्देश्यसे रखा भोजन यदि बिना उसकी स्वीकृतिके दूसरेको दिया जाय तो ऐसे अन्नको 'पर्यायान्न' कहा जाता है।