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गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished634 pages

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Page 109

काण्ड ] ज्योतिश्चक्रमें वर्णित नक्षत्र, उनके देवता एवं कतिपय शुभ-अशुभ योगोंका वर्णन ९९


आठ पाण्डुर (कुछ पीलापन लिये हुए सफेद) वर्णके घोड़ोंसे युक्त स्वर्णके रथपर विद्यमान बृहस्पति एक-एक राशिमें एक-एक वर्ष स्थित रहते हैं।

शनिका रथ आकाशसे उत्पन्न हुए चितकबरे घोड़ोंसे युक्त है। वे उसमें चढ़कर धीरे-धीरे चलते हैं। उनका मन्दगामी भी नाम है।

स्वर्भानु अर्थात् राहुके [रथमें] आठ घोड़े हैं, जो भ्रमरके सदृश काले हैं। उसका रथ धूसर* वर्णका है। हे भूतेश शिव! उन घोड़ोंको एक बार रथमें जोत दिये जानेपर वे निरन्तर चलते रहते हैं। इसी प्रकार केतुके रथमें भी वायुके समान वेगवाले आठ घोड़े हैं। उनके वर्णोंकी आभा पुवालसे निकलनेवाले धुएँके सदृश तथा लाक्षारसकी भाँति अरुण रंगकी है।

[हे शिव! इस प्रकार सूर्य-चन्द्रादि उपर्युक्त ग्रहोंसे युक्त] द्वीप, नदी, पर्वत, समुद्र आदिसे समन्वित समस्त भुवन-मण्डल भगवान् विष्णुका विराट् शरीर ही है। (अध्याय ५८)


ज्योतिश्चक्रमें वर्णित नक्षत्र, उनके देवता एवं कतिपय शुभ-अशुभ योगों तथा मुहूर्तोंका वर्णन

श्रीसूतजीने कहा— [ऋषियो!] केशवने भगवान् शिवसे पृथिवीका परिमाण बताकर कहा कि हे रुद्र! ज्योतिष्-शास्त्रकी गणना चार लाखमें है, पर उनमेंसे मैं अब ज्योतिश्चक्र अर्थात् नक्षत्रोंसे युक्त राशिचक्रका संक्षेपसे वर्णन करूँगा, जो सब कुछ देनेवाला है।

श्रीहरिने कहा— हे शिव! कृत्तिका नक्षत्रके देवता अग्नि हैं। रोहिणी नक्षत्रके देवता ब्रह्मा हैं। मृगशिराके चन्द्रमा तथा आर्द्राके रुद्र देवता कहे गये हैं। इसी प्रकार पुनर्वसुके आदित्य तथा तिष्य पुष्यके गुरु हैं। आश्लेषा नक्षत्रके सर्प तथा मघा नक्षत्रके देवता पितृगण हैं। पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्रके देवता भाग्य (भग), उत्तराफाल्गुनीके अर्यमा, हस्तके सविता और चित्राके देवता त्वष्टा हैं। स्वाती नक्षत्रके देवता वायु और विशाखा नक्षत्रके देवता इन्द्राग्नि हैं। अनुराधा नक्षत्रके देवता मित्र और ज्येष्ठाके शक्र (इन्द्र) देवता कहे गये हैं। नक्षत्रज्ञ विद्वानोंने मूल नक्षत्रका देवता निर्ऋतिको बताया है। पूर्वाषाढ नक्षत्रके देवता आप तथा उत्तराषाढके विश्वेदेव हैं। अभिजित्के देवता ब्रह्मा और श्रवणके विष्णु कहे गये हैं। धनिष्ठा नक्षत्रके देवता वसु तथा शतभिषाके वरुण कहे गये हैं। पूर्वाभाद्रपद नक्षत्रके देवता अजपाद, उत्तराभाद्रपदके अहिर्बुध्न्य, रेवतीके पूषा, अश्विनीके अश्विनीकुमार और भरणीके यम देवता कहे गये हैं।

प्रतिपदा तथा नवमी तिथिमें ब्रह्माणी नामकी योगिनी पूर्व दिशामें अवस्थित रहती है। द्वितीया और दशमी तिथिमें माहेश्वरी नामक योगिनी उत्तर दिशामें रहती है। पञ्चमी तथा त्रयोदशी तिथिमें वाराही नामक योगिनी दक्षिण दिशामें स्थित रहती है।

षष्ठी और चतुर्दशी तिथिमें इन्द्राणी नामकी योगिनीका वास पश्चिममें होता है। सप्तमी और पौर्णमासी तिथिमें चामुण्डा नामसे अभिहित योगिनीका निवास वायुगोचर अर्थात् वायव्यकोणमें रहता है। अष्टमी तथा अमावास्यामें महालक्ष्मी नामकी योगिनी ईशानकोणमें रहती है। एकादशी एवं तृतीया तिथिमें वैष्णवी नामकी योगिनी अग्निकोणमें वास करती है। द्वादशी और चतुर्थी


* थोड़े पाण्डु वर्णको धूसर और कुछ पीलापन लिये सफेद वर्णको पाण्डुरवर्ण कहते हैं।