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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

by महर्षि व्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished656 pages

Page 596 of 656

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Page 596

५९४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
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अतिबलिष्ठ गन्धर्वोंको मैंने भगा दिया॥ १३-१४ १/२ ॥
उस समय उनमेंसे कुछ तो मर गये, कुछ भाग गये
और कुछ सिर फूट जाने तथा पैर टूट जानेके कारण
भूमिपर गिर पड़े और उनके सैकड़ों खण्ड हो गये।
तत्पश्चात् [मेरे ऊपर आकाशसे] पुष्पोंकी वर्षा हुई। हे
देव ! इसके बाद आपके द्वारा आदिष्ट कर्तव्यको पूर्ण
करके मैं [यहाँ] चला आया॥ १५-१६॥
हे देव! आपकी इच्छाके विषयको अर्थात् आप
जिसे चाहते हैं, उसे समस्त त्रिलोकीमें ऐसा कौन है, जो
मार सके। इसलिये आपके नामका ही आश्रय लेकर
बालकके साथ होनेपर भी मैंने विजय प्राप्त की॥ १७॥
तब हर्षसे भरे भगवान् शंकरने नन्दिकेश्वरका
आलिंगन किया और प्रसन्न मनसे कहने लगे- नन्दिकेश्वर !
मैंने तुम्हारा दृढ़ पौरुष जान लिया है। इस त्रैलोक्यमें
तुम्हारी बराबरी करनेवाला कोई भी नहीं है ॥ १८ १/२ ॥
ब्रह्माजी बोले- इसके उपरान्त (शिवजीसे मिल
लेनेके पश्चात्) वे नन्दी विश्वनाथ शिवजीको प्रणाम
करके पार्वतीजीके समीप गये और हाथ जोड़कर उन्हें
प्रणामकर मधुर वाणीमें कहने लगे- हे मातः ! शिवजीकी
आज्ञासे मैं बालकको माहिष्मतीपुरी ले गया और
वरेण्यपत्नी पुष्पिकाके समीपमें रख आया हूँ; क्योंकि उस
(बालरूप गणेश) -ने उस पुष्पिकाको पूर्वमें वर प्रदान
किया था कि मैं तुम्हारा पुत्र बनूँगा और ब्रह्मतत्त्वका
प्रतिपादन करूँगा॥ १९-२१ १/२ ॥
तब उन नन्दीश्वरके वचनोंको सुनकर सब कुछ
जाननेवाली पार्वतीदेवी प्रसन्न हो गयीं। वे शिशु (-रूप
गणपति)-के अन्तहीन पराक्रमको जानती थीं, [अतः
गणपतिदेवके प्रति] परम भक्तिभावसे युक्त हो पार्वतीजी
नन्दीश्वरसे कहने लगीं- 'हे पुत्र! मैं तुम्हारे पुरुषार्थको
जानती हूँ॥ २२-२३॥
तुमने भयंकर घोष करनेवाली अत्यन्त भीषण
राक्षसीका संहार किया है, दुरात्मा गन्धर्वोंको नष्ट किया
तथा शिशुकी रक्षा की। [इसके अतिरिक्त] बिना उस
प्रसूताको ज्ञात हुए, उसके बालकको वहाँ पहुँचा भी
दिया है-ये सब महान् कृत्य थे, जो तुमने सम्पन्न किये
हैं।' इस प्रकारसे [प्रीतिपूर्वक] नन्दीश्वरसे कहकर
पार्वतीजीने उनको विदा किया और विश्राम करने
लगीं ॥ २४-२५ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डके अन्तर्गत 'गन्धर्वपराजयवर्णन' नामक
एक सौ इकतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १३१ ॥
एक सौ बत्तीसवाँ अध्याय
सिन्दूरका गजाननको ले जाकर नर्मदामें फेंकना, गजाननके रक्तसे रंजित
शिलाओंकी 'नार्मद गणेश' संज्ञा, उमामहेश्वरका कैलास-गमन
ब्रह्माजी बोले- एक बारकी बात है, दैत्यराज
सिन्दूर सभामें बैठा और अपने उन्मद अहंकारमें भरकर
कहने लगा कि मेरा पराक्रम तो व्यर्थ ही है; क्योंकि जब
इन्द्रादि देवगण तथा ब्रह्मा, विष्णु एवं रुद्र भी मुझसे युद्ध
करनेमें अक्षम हैं, तब पृथ्वीपर रहनेवाले राजाओंकी तो
बात ही क्या है!॥ १-२॥
जिस प्रकार पतिके बिना कुलवती महिलाका यौवन
व्यर्थ होता है, वैसे ही योद्धाओंके अभावमें आज मेरा
पराक्रम व्यर्थ हो गया है। तब (उसके ऐसा कहते ही)
आश्चर्यमयी आकाशवाणी उसे सुनायी पड़ी ॥ ३ १/२ ॥
आकाशवाणी बोली-अरे मूढ ! किसलिये तू
चपलता दिखा रहा है, तुझसे लड़नेवाला तो जन्म ले
चुका है। पार्वतीके उदरसे समुद्भूत वह गर्भ (शिशु)
इस समय वरेण्यके भवनमें स्थित है और अनन्त लीलाएँ
करनेवाला वह शिशु वहाँपर शुक्लपक्षके चन्द्रमाकी
भाँति बढ़ रहा है॥ ४-५॥
ब्रह्माजी बोले- एकाएक इस प्रकारकी
आकाशवाणीको सुनकर सिन्दूर मूर्च्छित हो गया और
[चेतना प्राप्त करके] वह शोकसे व्याकुल हो उठा और
सोचने लगा कि यह क्या है तथा किसने कहा है ? ॥ ६ ॥