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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

by महर्षि व्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished656 pages

Page 586 of 656

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Page 586

५८४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * : [ श्रीगणेशपुराण-
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करूँगा। ऐसा कहकर वह सिन्दूर पितामह ब्रह्माजीके | जायगी, वे गजानन 'सिन्दूरप्रिय' हो जायँगे और वे देव
पास गया। उसने अपने दोनों हाथ फैलाकर भयंकर | गजानन 'सिन्दूरवधकर्ता' के नामसे प्रसिद्ध हो जायँगे।
गर्जना की ॥ २८-३०॥ | ऐसा कहकर भयभीत हो कमलयोनि वे ब्रह्माजी वहाँसे
उसने ब्रह्माजीका आलिंगन करना चाहा, तब | शीघ्र ही चल पड़े ॥ ३४-३५ ॥
पितामह ब्रह्माजी उससे बोले, मैंने तुम्हें पुत्रस्नेहके कारण | वे ब्रह्मा मनकी गति तथा वायुके वेगके समान
ही वर प्रदान किये हैं, जो अन्यके लिये दुर्लभ हैं; किंतु | वहाँसे पलायित हुए थे, अतः तीव्रतावश श्वास लेने तथा
दुर्भावनावश तुम मेरा ही अपकार करनेके लिये यहाँ | छोड़नेके कारण वे हाँफने लगे। शाप सुनकर क्रुद्ध हुआ
आये हो, निश्चित ही सर्पको दिया गया दूध विष ही | वह दैत्य सिन्दूर भी उनके पीछे-पीछे दौड़ने लगा ॥ ३६ ॥
हो जाता है। तुम दुष्ट भावनासे ग्रस्त हुए हो, अतः | दौड़नेके कारण पसीनेसे भीगे शरीरवाला वह दुष्ट
जाओ, तुम दैत्य हो जाओगे। परमात्मा गजानन शीघ्र ही | दैत्य सिन्दूर जहाँ-जहाँ वे ब्रह्माजी जाते थे, उनको देखते
अवतार लेकर तुम्हारा वध कर डालेंगे ॥ ३१-३३॥ | हुए वह उनके पीछे-पीछे जाने लगा। अगला चरण
तुम्हारे शरीरमें सुगन्ध है, यह जानकर देव गजानन | रखते ही मैं इन्हें पकड़ लूँगा यह कहते हुए वह दैत्य
अपने अंगोंमें उस सुगन्धित सिन्दूरका लेप भी करेंगे। | पीछे दौड़ने लगा। काँपते हुए ब्रह्माजी शीघ्रतासे वैकुण्ठमें
इसीसे उन गजाननकी देह भी अरुणम वर्णकी हो | जा पहुँचे ॥ ३७॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'सिन्दूरकी उत्पत्तिका वर्णन' नामक
एक सौ सत्ताईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १२७॥
एक सौ अट्ठाईसवाँ अध्याय
ब्रह्माजीका नारायणको सिन्दूरदैत्यके विषयमें बताना, उसी समय सिन्दूरका वहाँ आना,
भगवान् विष्णुके कहनेपर सिन्दूरका भगवान् शिवसे युद्ध करने कैलासपर जाना,
शिवको ध्यानस्थ देखकर सिन्दूरका पार्वतीका हरण करना, मयूरेशका
द्विजरूपसे उपस्थित होकर सिन्दूरको समझाना, सिन्दूरका वापस
लौट जाना, मयूरेशद्वारा माता पार्वतीको अपने
गजानन-अवतारका स्मरण दिलाना
ब्रह्माजी बोले- ब्रह्माजीने वैकुण्ठलोकमें जाकर | उनकी सेवा-पूजा करके भगवान् विष्णुने उनसे
देखा कि भगवान् नारायण निर्विकार भावसे रत्नों तथा | पूछा कि कौन-सा ऐसा कार्य आपके समक्ष आ
सुवर्णसे सुशोभित कमलके आसनपर विराजमान हैं ॥ १ ॥ | उपस्थित हुआ है, आपका मुख क्यों मुरझाया हुआ है,
भगवान् विष्णुने भी अपने सामने म्लान मुखवाले | आप क्यों लम्बी-लम्बी साँस ले रहे हैं और प्रभाहीन
ब्रह्माजी और उनके पीछे आकाशसे स्पर्धा करनेवाले | क्यों दिखायी दे रहे हैं? हे पितामह ! आपकी ऐसी
मस्तकसे युक्त महादैत्य सिन्दूरको आता हुआ देखा ॥ २ ॥ | स्थिति देखकर मुझे महान् कष्ट हो रहा है ॥ ४१/२ ॥
यह देखकर दयालु लक्ष्मीपति भगवान् विष्णु | भगवान् विष्णुके इस प्रकारके वचनोंको सुनकर
सहसा शीघ्र ही उठ पड़े और उन्होंने ब्रह्माजीका हाथ | कमलयोनि ब्रह्माजी बोले ॥ ५ ॥
पकड़कर एवं उनका आलिंगनकर उन्हें अपने आसनपर | ब्रह्माजी बोले- मैं अपने भवनमें प्रगाढ़ निद्रामें
बैठाया ॥ ३ ॥ | सोया हुआ था, उसी समय भगवान् शिवने मुझे जगाया,