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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

by महर्षि व्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished656 pages

Page 567 of 656

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Page 567

क्री०ख०-अ०१२१ ] * राक्षसराज सिन्धुकी सेनाके साथ कार्तिकेय आदिका भयंकर संग्राम * ५६५

करके समस्त वीरोंका निरीक्षणकर बाणका एकाएक
धनुषपर सन्धान किया॥४४१/२॥
उस अस्त्रसे सहसा उत्पन्न अग्नि देवसेनाको और
साथ-ही-साथ वनों एवं पर्वतोंसहित समग्र पृथिवीको
दग्ध करने लगी ॥ ४५१/२॥
उस अग्निके द्वारा जलाये जाते हुए उन देवसैनिकोंने
उस अग्निसे उत्पन्न एक पुरुषको देखा, जो जटाएँ
धारण किये हुए था, उसका तेज प्रदीप्त हो रहा था,
उसकी जिह्वा विद्युत्के समान थी, उसका मुख बड़ा ही
भयंकर था और वह देवसैनिकोंको निगलता जा रहा था।
उसे देखकर कार्तिकेय आदि भयभीत हो गये और दसों
दिशाओंमें भाग गये। युद्धमें वह जिस-जिसका भक्षण
कर लेता था, वह-वह मयूरेशका स्मरण करता हुआ
प्रसन्नतापूर्वक उन मयूरेशके निज धामको प्राप्त कर लेता
था। इस प्रकारसे उस पुरुषने सम्पूर्ण देवसेनाका भक्षण
कर लिया ॥ ४६-४८१/२ ॥
वह देवसेना जिधर-जिधर जाती थी, वहाँ-वहाँ उस
पुरुषके मुखसे उत्पन्न अग्नि प्रलयाग्निके समान जलते
हुए उस सेनाको दग्ध कर देती थी, इस प्रकार मयूरेशकी
वह सेना अग्निके द्वारा दग्ध हो गयी ॥४९-५०॥
उस समय धुएँका महान् अन्धकार छा गया था,
उस अन्धकारमें कुछ भी दिखायी नहीं पड़ता था।
तदनन्तर सभी देववीर मयूरेशके पीछे छिप गये ॥ ५१ ॥
उस अग्निसे जलाये जाते हुए वे देवगण त्राहि-
त्राहि इस प्रकारसे करुण पुकार करने लगे। उस
निवारित किये न जा सकनेवाले महान् अस्त्रको देखकर
देव मयूरेश तेजहीन-से हो गये और लोकमें अपमानित
होनेके भयसे वे विचार करने लगे कि यदि इस
समय भगवान् शिव कृपा करें, तभी यहाँ हमारी
विजय हो सकती है ॥ ५२-५३॥
ऐसा कहनेके अनन्तर मयूरेशने हाथमें परशु धारण
किया और उसे मन्त्रोंसे अभिमन्त्रितकर बलपूर्वक
शत्रुसेनापर फेंका, अपने तेजसे सूर्यके तेजको भी
जीत लेनेवाला वह अभिमन्त्रित परशु आकाश तथा
दिशाओंको निनादित करते हुए तथा शत्रुसेनाको दग्ध
करते हुए ऐसे जा रहा था, मानो कल्पान्तके समयकी
प्रलयाग्नि जा रही हो ॥ ५४१/२ ॥
उस प्रज्वलित अग्निसदृश परशुसे भी एक महान्
पुरुष प्रकट हुआ, जिसके मुखमें आकाशसहित सम्पूर्ण
भूमण्डल भी प्रवेश करते हुए आकारमें छोटा पड़ जाय।
तदनन्तर उस उत्पन्न पुरुषका सिन्धुदैत्यके पुरुष योद्धाके
साथ और उस अस्त्र परशुका [सिन्धुके द्वारा प्रयुक्त]
अस्त्रके साथ युद्ध होने लगा। तब उस युद्धको देखनेके
लिये देवर्षिगण वहाँ उपस्थित हो गये। मयूरेशके उस
यमराजतुल्य अस्त्र परशुने शीघ्र ही दैत्य सिन्धुके
अस्त्रका भक्षण कर डाला ॥ ५५-५७॥
तदनन्तर ज्वालाओंकी मालासे युक्त अग्निदेवके
सदृश वह आग्नेयास्त्र दैत्यकी सेनाको जलानेके लिये
चल पड़ा। दैत्यराज सिन्धुने भी उस अस्त्रको आता हुआ
देखकर बाणोंकी वृष्टि करनी शुरू कर दी ॥ ५८ ॥
उस सिन्धुके अभिमन्त्रित एक बाणसे अनन्त
संख्यामें बाण प्रकट होने लगे। देवसेनाके अत्यन्त तीव्र
गतिवाले योद्धा उस दैत्यकी बाणवृष्टिसे आच्छादित हो
गये। तब क्रुद्ध होकर मयूरेशने उस समय नाना प्रकारके
अस्त्रोंकी सृष्टि की। उन अस्त्रोंने दैत्यराज सिन्धुके सभी
अस्त्रोंको निरस्त कर डाला ॥ ५९-६० ॥
तदनन्तर अस्त्र (परशु)-से उत्पन्न उस कालपुरुषने
दैत्यसेनाका पुनः भक्षण कर डाला। वे दैत्य सैनिक
भाग-भागकर जहाँ-जहाँ जाते थे, वहाँ-वहाँ वह
कालपुरुष पहुँच जाता था ॥ ६१ ॥
तब चिन्ताग्रस्त हुआ वह दैत्य सिन्धु उस समय
अब क्या करना चाहिये, यह निश्चित नहीं कर सका।
क्या करणीय है, कहाँ जाना चाहिये और कहाँ ठहरना
चाहिये-इस प्रकारसे वह चिन्ता करने लगा ॥ ६२ ॥
सूर्यके अस्त हो जानेपर वह अपने घरकी ओर
लौट चला। उसके कुण्डल तथा अन्य आभूषण नष्ट हो
चुके थे। वह भूमिपर गिरते-पड़ते हुए जा रहा था ॥ ६३ ॥
उसने अपने नगरमें प्रवेश किया, उस समय वह
औघड़ शिवके समान अस्त-व्यस्त प्रतीत हो रहा था।
वह वहाँ किसी गुप्त स्थानमें स्त्रियों तथा अनुचरोंकी