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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

by महर्षि व्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished656 pages

Page 505 of 656

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Page 505

क्री०ख०-अ०१७] * माता कद्रूका अपने पुत्र शेषनागके पास पातालमें जाना * ५०३
श्रवण करो। हे पुत्र! विनता मेरी सौत है, जो पक्षियोंकी
माता है। एक बारकी बात है कि मुझे उसे देखनेकी
इच्छा हुई॥ १२-१३॥
मैं एकाएक उसके घर गयी तो उसने मेरा अपमान
किया। उसने न तो मुझे बैठनेके लिये आसन दिया, और
न ही कोई स्वागत-सत्कार किया॥ १४॥
पूर्व समयके वैरका स्मरण करते हुए उसने अपने
पुत्र जटायुको आदेश दिया। तदनुसार जटायुने मेरी
बालोंकी गूँथी हुई चोटीको खींचा और मुझे क्षणभरमें
ही वस्त्ररहित कर डाला॥ १५॥
वह मुझसे बोला, अरी महादुष्टे! तुम्हारा मुख
देखनेयोग्य नहीं है। पूर्वकालमें तुमने मेरी माताको अपनी
दासी बनाया था, तब उस समय तुम्हारे मनमें लेशमात्र
भी करुणा नहीं आयी, अरी महादुष्टे! तुम यहाँसे चली
जाओ, नहीं तो मैं तुम्हारे प्राण ले लूँगा॥ १६-१७॥
हे फणीश्वर! मैं उस जटायुके वचनोंको सुनकर
अत्यन्त दुखी हुई। मैंने तब अत्यन्त विलाप किया और
प्राणोंका त्याग करनेका निश्चय कर लिया॥ १८॥
अत्यन्त दुखी होनेके कारण ही मैं तुम लोगोंको
देखने तुम्हारे पास आयी हूँ, यदि तुम लोगोंकी मुझमें
भक्ति है तो मेरी सहायता करो॥ १९॥
हे श्रेष्ठ पुत्रो! यदि तुम लोग मुझे मानते हो तो
मेरी उस सपत्नी विनताका वध कर डालो, तभी मेरे
हृदयमें सुख होगा॥ २०॥
ब्रह्माजी बोले—माता कद्रूके इस प्रकारके वचनोंको
सुनकर शेषनाग सहसा वैसे ही रोषसमन्वित हो प्रज्वलित
हो उठे, जैसे कि अग्निमें घी पड़नेपर वह और भी
अधिक प्रदीप्त हो उठती है। 'यदि विनताके पुत्रोंने मेरी
माता कद्रूको पीड़ा पहुँचायी है, तो निश्चित ही मैं उसका
बदला लूँगा, इसमें कोई संशय नहीं है'॥ २१-२२॥
ऐसा कहकर उन शेषनागने वासुकि आदि प्रमुख
नागोंके साथ वहाँ जानेका मन बनाया, जहाँ कि विनता
रह रही थी॥ २३॥
वासुकि बोला—हे निष्पाप! करोड़ों नागोंको
लेकर मैं वहाँ जाऊँगा और विनताको यहाँ ले आऊँगा।
हे नागराज! आप यहाँपर स्थित रहिये॥ २४॥
ब्रह्माजी बोले—ऐसा कहनेके अनन्तर वासुकि
नाग शीघ्र ही विनताके आश्रमकी ओर निकल पड़ा।
असंख्य नागोंको देखकर उस समय विनता भयभीत हो
उठी। उसी क्षण दुष्ट स्वभाववाले क्रूर सर्पोंने उसे चारों
ओरसे लपेट लिया और वे उसे शेषनागके समीपमें ले
गये। उस समय वह विनता उन नागोंसे बोली॥ २५-२६॥
विनता बोली—अरे पापिष्ठो! तुम लोग मुझे
शीघ्र ही बतलाओ कि क्यों मुझे बन्धनमें डालकर ले
जाना चाहते हो, मैंने तो कोई अपराध भी नहीं किया
है? मेरे पुत्र गरुड़का स्वभाव तो सभी सर्पोंको विदित
ही है, अतः मुझे छोड़ दो, यदि ऐसा नहीं करोगे तो मेरा
वह पुत्र गरुड़ तुम्हारा संहार कर डालेगा॥ २७-२८॥
ब्रह्माजी बोले—उन सर्पोंकी धृष्टताको देखकर
उसने गरुड़का स्मरण किया। वह गरुड़ भी 'माताके
द्वारा मेरा स्मरण किया जा रहा है', यह जानकर
पक्षियोंके साथ वहाँ चला आया॥ २९॥
गरुड़के साथ बाज पक्षी, सम्पाति तथा पक्षिश्रेष्ठ
जटायु भी था, जिनके पंखोंकी हवासे तीनों लोक काँप
उठे। इधर वे सभी सर्प भी विषकणोंका वमन करने
लगे। उस समय नागराजों तथा पक्षियोंमें घनघोर युद्ध
होने लगा॥ ३०-३१॥
तदनन्तर वे नाग जटायु, सम्पाति तथा बाज पक्षीको
बन्धनमें डालकर ले गये। माताके द्वारा स्मरण किये
जानेपर वह गरुड़ भी अपने पंखोंकी हवासे सम्पूर्ण
जगत्‌को कँपाता हुआ तथा वृक्षों और पर्वतोंको गिराता
हुआ वहाँ आ पहुँचा। उसकी गन्धको सूँघकर सभी सर्प
भाग गये॥ ३२-३३॥
दूसरे सर्प गरुड़के पंखोंकी हवासे आकाशमें
चक्कर काटने लगे। विनता सर्पोंके बन्धनसे मुक्त हो
गयी और वह अपने स्थानपर जानेके लिये उत्सुक हो
उठी। विनताको जानेके लिये उद्यत देखकर वासुकि नाग
अत्यन्त क्रुद्ध हो गया और आकाशको दग्ध करता हुआ