श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
by महर्षि व्यास
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
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Read in context४८८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
वे मुनिबालकका रूप बनाकर मुनिबालकोंके साथ
खेल खेलने लगे। जब देवी पार्वती उन्हें देखने उनके
पीछे गयीं तो उनके बीच उन्होंने अपने पुत्रको नहीं
देखा। उन्होंने उन मुनिबालकोंसे पूछा- मेरा बालक
कहाँ चला गया ? मेरी अँगुलीमें दाँत काटकर वह चंचल
बालक भाग रहा है ॥ ११-१२ ॥
वे मुनिपुत्र उनसे बोले- आपका पुत्र यहाँसे चला
गया है। तब उन्हें खोजने पार्वती आगे-आगे बढ़ने
लगीं। उनके बालोंकी चोटी खुल गयी थी, खोजनेके
परिश्रमसे वे पसीनेसे लथपथ हो गयी थीं, इधर-उधर
दौड़ती हुई उन पार्वतीके वस्त्र तथा आँचल अपने
स्थानसे खिसक गये थे। माताका इस प्रकारका परिश्रम
देखकर वे गुणेश अपना पहलेवाला बालकरूप धारणकर
माताके पास आये, तब देवी गिरिजाने अपने हाथोंसे उन्हें
दृढ़तापूर्वक पकड़ लिया ॥ १३-१५ ॥
अपने आँचलसे उन्हें बाँधकर वे प्रसन्नचित्त हो
अपने भवनको गयीं। वे उनसे गुस्सेसे बोलीं- अब तुम
ठीकसे मेरे हाथमें आ गये हो। हे अपस्मारसे आक्रान्त
व्यक्तिसे भी अधिक अस्थिर बालक ! मैं इस समय तुम्हें
बहुत अधिक मारूँगी, अथवा भगवान् शंकरसे तुम्हारी
शिकायत करूँगी, वे ही तुम्हें मारेंगे ॥ १६-१७ ॥
माताके इस प्रकारके वचनोंको सुनकर बालक
गुणेश भूमिपर लोट गये और फिर अपनेको बन्धनसे मुक्त
देखकर पुनः तेजीसे भाग चले ॥ १८ ॥
तब पार्वती अत्यन्त विह्वल तथा दुःखित होकर
उनके पीछे फिर दौड़ पड़ीं। इसी समय कर्दमासुर नामक
एक दुष्ट दानव वहाँ आया। वह ब्राह्मणका रूप धारण
किये हुए था, उसने माला पहनी हुई थी, वह अपने
दाहिने हाथमें जलसे भरा हुआ कमण्डलु लिये हुए था।
उसका सारा शरीर भस्मसे पुता हुआ था ॥ १९-२० ॥
वह अरुणोदयकालीन सूर्यकी अरुणिम आभाके
समान वस्त्र पहने हुए था। वह अत्यन्त मायावी था। वह
बालकसे इस प्रकार का वचन कहने लगा- तुम किस
कारणसे भाग रहे हो, मैं शीघ्र ही तुम्हारे भयका निवारण
कर दूँगा, इसमें कोई संशय नहीं है। मैं तुम्हें ऐसे
स्थानपर ले जाऊँगा, जहाँ तुम्हारी माता तुम्हें किसी
प्रकार भी जान नहीं पायेंगी। वहाँ न तो कालका
कोई भय होगा और न अणुमात्र भी अन्य कोई भय
होगा ॥ २१-२२ १/२ ॥
ब्रह्माजी बोले- तब भयभीत बालक गुणेश उससे
बोले- आप वैसा ही करें, जिससे कि मेरे माता-पिता मुझे
न देख सकें। मैं आपकी शरणमें आया हूँ। इस प्रकार
कहते हुए वे गुणेश बालस्वभाववश ज्यों ही उसके समीप
में गये, त्यों ही वह दुष्ट कर्दमासुर उस कोमल बालकको
उसी प्रकार निगल गया, जिस प्रकार कि पके हुए केलेके
टुकड़ेको निगल लिया जाता है ॥ २३-२५ ॥
इधर पार्वती भूमिपर बालक गुणेशके चरणकमलोंके
चिह्न देखती हुई आगे बढ़ती गयीं। उन्होंने सामने एक
ब्राह्मणको देखा तो उससे उन्होंने अपने बालकके
विषयमें पूछा- हे स्वामिन् ! क्या आपने मेरे पुत्रको
यहाँसे जाते हुए देखा है? हे विप्र ! ये देखिये, भूमिपर
पड़े हुए ये चरणकमलोंके चिह्न उसीके हैं ॥ २६-२७ ॥
हे द्विज ! यहाँसे दौड़ता हुआ वह न जाने कहाँ
गायब हो गया ? तब बालकके वियोगसे दुखी उन
पार्वतीसे वह ब्राह्मण कहने लगा ॥ २८ ॥
द्विज बोला- हे अनघे ! हे माता ! आपके बालकसे
हमारा क्या प्रयोजन है? हे माता ! हम तो सब प्रकारसे
उदासीन रहनेवाले और ईश्वरके ध्यानमें दत्तचित्त रहनेवाले
हैं। फिर भी आप पूछ रही हैं तो हम कहते हैं कि हे
शैलपुत्री ! हमने आपके पुत्रको कहीं भी नहीं देखा है,
हे देवि ! क्या आपने अपने बालकको हमारे अधीन किया
हुआ था ? ॥ २९-३० ॥
ब्रह्माजी बोले- उसके इस प्रकारसे कहनेपर उन
शैलपुत्रीको अत्यन्त दुःखित देखकर निर्विकार गुणेश्वर
उस कर्दमासुरके मुखसे बाहर प्रकट हो गये ॥ ३१ ॥
तब देवी पार्वती अपने पुत्रको पाकर उस विप्रदेहधारी
कर्दमासुरसे बोलीं- आप झूठ क्यों बोलते हैं? आपके
निकट ही यह पुत्र देखा गया है, निश्चित ही आपने ही
इसे गायब किया है। सन्तोंका यह स्वभाव होता है कि
वे प्राणोंपर संकट आ जानेपर भी कभी भी मिथ्या वचन