श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
by महर्षि व्यास
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
Page 105 of 656
Read in contextउ०ख०-अ०३२] * देवताओंकी गौतममुनिसे इन्द्रके शापोद्धारहेतु प्रार्थना * १०३
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स्वभाव तथा उसके स्वरूप, स्वभाव एवं उसकी चेष्टाओंमें | जब इन्द्रने अपने शरीरकी ओर देखा तो उसमें स्त्रीयोनिके
अन्तर नहीं ज्ञात हुआ। जब राजा दशरथके पुत्र श्रीराम वन- | सहस्र चिह्न हो गये थे। तब बल और वृत्र नामक असुरोंका वध
वनमें भ्रमण करते हुए यहाँ आयेंगे, तब तुम उनके चरणस्पर्शसे | करनेवाले इन्द्र दुःखके सागरमें निमग्न हो गये ॥ २२ १/२ ॥
पुनः अपने स्वरूपको प्राप्त कर लोगी ॥ १४-१५ ॥ | इन्द्र बोले—मैं वृद्धजनोंद्वारा अनेक बार धर्मोपदेशोंसे
नारदजी बोले—तब वह उन तपोनिधिके वचनोंके | शिक्षित किया गया था, परंतु मैंने उन वृद्धजनोंके
प्रभावसे शिला हो गयी और अहल्याको प्राप्त शापको | वचनोंपर आदरपूर्वक विचार नहीं किया। अपनी बुद्धिद्वारा
सुनकर इन्द्र उसी प्रकार काँपने लगे, जैसे प्रचण्ड वायुके | किया हुआ निर्णय हितकर और दूसरेकी प्रेरणासे किया
वेगसे हिमालयपर्वत। वे अपने मनमें तर्क-वितर्क करने | गया कार्य विनाशका हेतु होता है ॥ २३-२४ ॥
लगे कि अब मुझे क्या करना चाहिये ? ॥ १६-१७ ॥ | गुरुद्वारा दी गयी बुद्धि श्रेष्ठ होती है, जबकि स्त्रीमें
यदि मैं समुद्रके मध्यमें, कुएँमें या तालाबमें अथवा | आसक्त बुद्धि क्षयकारिणी होती है। नारदका वचन
कमलमें भी छिप जाऊँ तो भी ये [गौतम] मुनि मुझे | मानकर मैंने उस अनिन्दिता [मुनिपत्नी अहल्या]-से
जान जायँगे ॥ १८ ॥ | कैसे दुष्कर्म कर लिया ! ॥ २५ ॥
अतः वज्र धारण करनेवाले उन इन्द्रने बिडालका | [इस गर्हित कर्मके कारण] देवताओंका राजा होते
रूप धारण किया और वहाँसे चले गये। तदनन्तर जब | हुए भी मैं संसारमें अपना मुख कैसे दिखलाऊँगा? वह
गौतमने घरमें, द्वारपर और आश्रममें उन्हें कहीं नहीं देखा | मेरी दिव्य देह आज कहाँ चली गयी? [इस सहस्र
तो सोचने लगे कि वह दानवोंका शत्रु इन्द्र कहाँ चला | भगयुक्त अपने शरीरके विषयमें] मैं अपनी पत्नीसे क्या
गया, जिसने मेरी भार्याको विदूषित किया है? तब | कहूँगा ? ॥ २६ ॥
उन्होंने ध्यान किया तो क्षणमात्रमें उन मुनिश्रेष्ठने सब | मुझे धिक्कार है! और उस कामदेवको धिक्कार
कुछ जान लिया ॥ १९-२० ॥ | है, जिसके कारण मैं इस निन्दित अवस्थाको प्राप्त हुआ
[तदनन्तर उन्होंने कहा—] रे दुष्ट! चूँकि तू | हूँ। प्राणियोंको अपने द्वारा किये गये शुभ अथवा अशुभ
देवेन्द्र है, इसलिये तुझे भस्म नहीं करूँगा, परंतु हे | कर्मका फल भोगना ही पड़ता है ॥ २७ ॥
शचीपति ! मैं तुझे शाप देता हूँ कि तेरा शरीर स्त्रीयोनिके | मैं अपने इस पापका तिर्यक् योनिमें जाकर भोग
एक हजार चिह्नोंसे युक्त हो जाय ॥ २१ ॥ | करूँगा। मैं इन्द्रगोप (वीरबहूटी) नामक कीटका रूप
मुनिद्वारा रोषपूर्वक कहे गये इन वचनोंको सुनकर | धारणकर कमलिनीकी कलीमें स्थित हो जाता हूँ ॥ २८ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'शक्रशापवर्णन' नामक इकतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३१ ॥
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बत्तीसवाँ अध्याय
देवताओंकी गौतममुनिसे इन्द्रके शापोद्धारहेतु प्रार्थना और गौतममुनिका
उन्हें षडक्षर मन्त्रका उपदेश देना
नारदजी बोले-[हे राजा रुक्मांगद !] इन्द्र जब | शारीरिक विरूपताकी बात बतायी ॥ २ ॥
कमलिनी [-की कली]-में चले गये, तब मैं उनके | [मैंने उनसे कहा कि] हे देवताओ! इन्द्रने
लोकको गया। वहाँ मैंने बृहस्पति आदि प्रमुख देवताओंको | अहल्याका सतीत्व हरण किया, जिसके कारण गौतमके
[चिन्तातुर] बैठे देखा ॥ १ ॥ | शापसे इन्द्रके शरीरमें सहस्र भग हो गये और वह
मैंने उन सबको अहल्या और इन्द्रके समागम, उन | अहल्या शिला हो गयी ॥ ३ ॥
दोनोंको शापकी प्राप्ति और उसके कारण उनकी | ब्रह्माजी बोले-[हे व्यास!] नारदजीका कथन