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ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

by आचार्य आनन्दवर्धन

DevanagariHindipublished680 pages

Page 11 of 680

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Page 11

पश्यन्ती
'ध्वनिनाऽतिगभीरेण काव्यतत्त्वनिवेशिना।
आनन्दवर्धनः कस्य नासीदानन्दवर्धनः' ॥
राजशेखर : जल्हणसंकलित 'सूक्तिमुक्तावली'
‘ध्वनिकृतामालङ्कारिकसरणि व्यवस्थापकत्वात्'—
पण्डितराज : रसगङ्गाधर
ध्वन्यालोक
ध्वन्यालोक भारतीय साहित्यशास्त्र का महनीयतम निर्माण है। यह एक आलोक-स्तम्भ की
भांति अपने चतुर्दिक् आलोक विकीर्ण करके काव्य के अनुन्मीलितपूर्व आभ्यन्तर पक्षों को आलोकित
करता हुआ आज भी चिरनवीन बना हुआ है। जैसा कि पण्डितों का कहना है, ध्वन्यालोक का
अलङ्कार-साहित्य में वही स्थान है जो व्याकरण में पाणिनि के सूत्रग्रन्थ का और वेदान्त में
वेदान्तसूत्र का।
यह प्रमाणित सत्य है कि चाहे विचार का कोई क्षेत्र हो, जब भी स्थूल का आधिपत्य हुआ,
तभी सूक्ष्म ने उसके विपरीत या विरोध में क्रान्ति की। दर्शन में कभी स्थूलदर्शी चार्वाकों का
बहुत जोर था, इसके विरोध में आचार्य शङ्कर द्वारा सूक्ष्म वेदान्तिक आत्मवाद की प्रतिष्ठा हुई।
इसी प्रकार साहित्य में भामह, दण्डी, उद्भट, वामन प्रभृति आचार्यों के सामने काव्य का स्थूल
शरीर-पक्ष प्रधान बना रहा। जब आचार्य भामह ने 'शब्दार्थों सहितौ काव्यम्' कह कर स्पष्टतः
शब्द-अर्थ को काव्य का शरीर स्वीकार किया, तब इस काव्य-शरीर के शोभाधायक तत्त्वों में गुण,
अलङ्कार, रीति तथा वृत्तियाँ स्वीकार की गईं। इन सभी में अलङ्कार को काव्य के सौन्दर्य के लिए
अनिवार्य स्वीकार किया गया (काव्यं ग्राह्यमलङ्कारात्···सौन्दर्यमलङ्कारः—वामन )। 'प्राधान्येन
व्यपदेशा भवन्ति' इस न्याय के बल पर ही व्यापक अर्थ में समग्र साहित्यशास्त्र को 'अलङ्कार-शास्त्र'
एवं साहित्यिक आचार्यों को 'आलङ्कारिक' कहने की प्रवृत्ति चल पड़ी थी। 'साहित्य' शब्द काव्य के
क्षेत्र में भामह के 'सहितौ' प्रयोग से शब्द और अर्थ के सहभाव या साहचर्य के आधार पर
प्रचलित हुआ जान पड़ता है। इस प्रकार साहित्य में शरीरवाद के विपक्ष में आत्मवाद की प्रतिष्ठा
के उद्देश्य से ध्वन्यालोक का निर्माण हुआ। इसका आकलनीय सङ्केत 'लोचन' टीका में आचार्य
अभिनवगुप्त ने कर दिया है—'वाच्यसंवलनाविमोहितहृदयैस्तु तत्पृथग्भावे विप्रतिपद्यते, चार्वाकै-
रिवात्मपृथग्भावे ।' (पृ० ४४) अर्थात् चार्वाक लोग जिस प्रकार आत्मा का शरीर से पृथग्भाव
मानने में विरुद्ध आपत्तियाँ उठाते हैं, उसी प्रकार जिन लोगों का हृदय वाच्य अर्थमात्र के
सम्मिश्रण में विमोह की स्थिति प्राप्त कर चुका है वे वाच्य के अतिरिक्त किसी अर्थ के पृथग्भाग में
सन्देह करते हैं।