सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation

महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा

DevanagariHindipublished213 पृष्ठ

पृष्ठ 14, कुल 213 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 14

१।६ ] यमकवग्गो [ ३
४—अक्कोच्छि मं अवधि मं अजिनि मं अहासि मे ।
ये तं न उपनय्हन्ति वेरं तेसूपसम्मति ॥४॥
( अक्रोशीत् मां अवधीत् मां अजैषीत् मां अहार्षीत् मे ।
ये तत् नोपनह्यन्ति वैरं तेषूपशाम्यति ॥४॥ )
अनुवाद—'मुझे गाली दिया'० ( ऐसा ) जो ( मनमें ) नहीं रखते
उनका वैर शान्त हो जाता है ।
श्रावस्ती ( जेतवन ) काली ( यक्खिनी )
५—न हि वेरेन वेरानि सम्मन्तीध कुदाचनं ।
अवेरेन च सम्मन्ति एस धम्मो सनन्तनो ॥५॥
( न हि वैरेण वैराणि शाम्यन्तीह कदाचन ।
अवैरेण च शाम्यन्ति, एष धर्मः सनातनः ॥ ५ ॥ )
अनुवाद—यहाँ ( संसारमें ) वैरसे वैर कभी शान्त नहीं होता, अवैर
से ही शान्त होता है, यही सनातन धर्म (=नियम ) है ।
श्रावस्ती ( जेतवन ) कोसम्बक भिक्खू
६—परे च न विजानन्ति मयमेत्थ यमामसे ।
ये च तत्थ विजानन्ति ततो सम्मन्ति मेधगा ॥६॥
( परे च न विजानन्ति वयमत्र यंस्यामः ।
ये च तत्र विजानन्ति ततः शाम्यन्ति मेधगाः ॥ ६ ॥ )
अनुवाद—अन्य ( अज्ञ लोग ) नहीं जानते, कि हम इस ( संसार )
से जानेवाले हैं । जो इसे जानते हैं, फिर ( उनके )
मनके ( सभी विकार ) शान्त हो जाते हैं ।