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देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

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DevanagariHindipublished889 pages

Page 885 of 889

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Page 885
८७६श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ३१

अथैकत्रिंशोऽध्यायः

व्यासजीका राजा जनमेजयसे भगवतीकी महिमाका वर्णन करना

व्यास उवाचव्यासजी बोले—हे महाराज! मैंने नारदजीसे योगमायाके पवित्र अक्षरोंवाले जिस माहात्म्यको सुना है, उसे कहता हूँ; आप सुनें॥ १॥
निशामय महाराज ब्रवीमि विशदाक्षरम्।<br>माहात्म्यं खलु मायाया नारदात्तु मया श्रुतम्॥ १
मया पुनर्मुनिः पृष्टो नारदः सर्ववित्तमः।<br>श्रुत्वा कथां मुनेस्तस्य नारीदेहसमुद्भवाम्॥ २महर्षि नारदकी नारी-देहसे सम्बन्धित कथा सुनकर मैंने उन सर्वज्ञशिरोमणि मुनिसे पुनः पूछा—हे नारदजी! अब आप यह बताइये कि इसके बाद भगवान् विष्णुने आपसे क्या कहा और आपके साथ वे जगत्पति लक्ष्मीकान्त कहाँ गये?॥ २-३॥
ब्रूहि नारद पश्चात्किं कथितं हरिणा तदा।<br>क्व गतश्च जगन्नाथो भवता सह माधवः॥ ३
नारद उवाचनारदजी बोले—उस अत्यन्त मनोहर सरोवरके तटपर मुझसे इस प्रकार कहकर भगवान् विष्णुने गरुडपर आरूढ़ होकर वैकुण्ठके लिये प्रस्थान करनेका विचार किया॥ ४॥
इत्युक्त्वा भगवांस्तस्मिंस्तडागेऽतिमनोहरे।<br>आरुह्य गरुडं गन्तुं वैकुण्ठे च मनो दधे॥ ४
मामुवाच रमाकान्तो यथेष्टं गच्छ नारद।<br>एहि वा मम लोकं त्वं यथारुचि तथा कुरु॥ ५तदनन्तर रमापति विष्णुने मुझसे कहा—हे नारद! अब आप जहाँ जाना चाहें, जायें। अथवा मेरे लोक चलिये। जैसी आपकी रुचि हो वैसा कीजिये॥ ५॥
ब्रह्मलोकं गतश्चाहमापृच्छ्य मधुसूदनम्।<br>भगवानपि देवेशस्तत्क्षणाद् गरुडासनः॥ ६इसके बाद मैं मधुसूदन श्रीविष्णुसे आज्ञा लेकर ब्रह्मलोक चला गया। गरुडासीन होकर वे देवेश भगवान् विष्णु भी मुझे आदेश देकर उसी क्षण बड़े आनन्दसे शीघ्र ही वैकुण्ठ चले गये॥ ६ १/२॥
वैकुण्ठमगमत्तूर्णं मामादिश्य यथासुखम्।<br>ततोऽहं पितृसदनं गतो याते जनार्दने॥ ७तत्पश्चात् श्रीविष्णुके चले जानेपर समस्त परम अद्भुत सुखों तथा दुःखोंके सम्बन्धमें विचार करता हुआ मैं अपने पिता ब्रह्माजीके भवनपर जा पहुँचा। हे मुने! वहाँ पहुँचकर पिताजीको प्रणाम करके ज्यों ही मैं उनके सामने खड़ा हुआ, तभी उन्होंने मुझे चिन्तासे व्यग्र देखकर पूछा॥ ७-८ १/२॥
चिन्तयन्सकलं दुःखं सुखं च परमाद्भुतम्।<br>गत्वा प्रणम्य पितरं स्थितो यावत्पुरः पितुः॥ ८
तावत्पृष्टो मुने पित्रा वीक्ष्य चिन्तातुरं तु माम्।
ब्रह्मोवाचब्रह्माजी बोले—हे महाभाग! आप कहाँ गये थे? हे सुत! आप क्यों इतने घबराये हुए हैं? हे मुनिश्रेष्ठ! आपका चित्त इस समय स्वस्थ नहीं दिखायी पड़ रहा है। क्या किसीने आपको धोखेमें डाल दिया है अथवा आपने कोई आश्चर्यजनक दृश्य देखा है? हे पुत्र! आज मैं आपको उदास तथा विवेकसे कुण्ठित क्यों देख रहा हूँ?॥ ९-१० १/२॥
क्व गतोऽसि महाभाग कस्माच्चिन्ततुरः सुत॥ ९
स्वस्थं नैवाद्य पश्यामि मनस्ते मुनिसत्तम।<br>केनापि वञ्चितोऽसि त्वं दृष्टं वा किञ्चिदद्भुतम्॥ १०
विषण्णं गतविज्ञानं पश्यामि त्वां कथं सुत।
नारद उवाचनारदजी बोले—पिता ब्रह्माजीके ऐसा पूछनेपर मैंने आसनपर बैठकर मायाके प्रभावसे उत्पन्न अपना सम्पूर्ण वृत्तान्त उनसे कहा—हे पिताजी! महान् शक्तिशाली विष्णुने मुझे ठग लिया था। बहुत वर्षोंतक
इति पृष्टस्तदा पित्रा बृस्यां समुपवेश्य च॥ ११
तमब्रुवं स्ववृत्तान्तं मायाबलसमुद्भवम्।<br>वञ्चितोऽहं पितः कामं विष्णुना प्रभविष्णुना॥ १२