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देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

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DevanagariHindipublished889 pages

Page 815 of 889

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Page 815
८०६श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १७

| तानाह प्रणतान्दुःखान्नाश्वास्य गतलोचनान्।<br>गृहीता न मया दृष्टिर्युष्माकं क्षत्रियाः किल॥ ३० | क्षत्रियोंको आश्वासन देकर कहा—हे क्षत्रियो! आपलोग निश्चितरूपसे जान लें कि मैंने आप सबकी दृष्टिका हरण नहीं किया है॥ २९-३०॥ |
| नाहं रुषान्विता सत्यं कारणं शृणुताद्य यत्।<br>अयं च भार्गवो नूनमूरुजः कुपितोऽद्य वः॥ ३१ | मैं आपलोगोंपर कुपित नहीं हूँ। अब मैं वास्तविक कारण बता रही हूँ, आपलोग सुनिये। मेरी जंघासे उत्पन्न यह भृगुवंशी बालक आज आपलोगोंपर कुपित है। क्षत्रियोंके द्वारा अपने बान्धवों और यहाँतक कि गर्भस्थित बालकोंका वध किये जानेकी बात जानकर कोपाविष्ट इसी बालकने आपलोगोंके नेत्र स्तम्भित कर दिये हैं॥ ३१-३२॥ |
| चक्षूंषि तेन युष्माकं स्तम्भितानि रुषावता।<br>स्वबन्धून्निहताञ्ज्ञात्वा गर्भस्थानपि क्षत्रियैः॥ ३२ | |
| अनागसो धर्मपरांस्तापसान्धनकाम्यया।<br>गर्भानपि यदा यूयं भृगूनघ्नंस्तु पुत्रकाः॥ ३३ | हे वत्सगण! जब आपलोग निरपराध, धर्मनिष्ठ तथा तपस्वी भार्गव ब्राह्मणों और गर्भस्थ बालकोंको भी धन-लोलुपतामें पड़कर मार रहे थे तभी मैंने इसे अपनी जंघामें गर्भरूपसे एक सौ वर्षतक धारण किये रखा। भृगुवंशकी वृद्धिके लिये इस गर्भस्थ बालकने छहों अंगोंसहित सम्पूर्ण वेदोंका बड़े सहजभावसे अध्ययन कर लिया है और अब यह अपने पितृजनोंके वधसे अत्यन्त कुपित होकर आपलोगोंका संहार करना चाहता है॥ ३३—३५॥ |
| तदायमूरुणा गर्भो मया वर्षशतं धृतः।<br>षडङ्गश्चाखिलो वेदो गृहीतोऽनेन चाञ्जसा॥ ३४ | |
| गर्भस्थेनापि बालेन भृगुवंशविवृद्धये।<br>सोऽपि पितृवधान्नूंनं क्रोधोद्धो हन्तुमिच्छति॥ ३५ | |
| भगवत्याः प्रसादेन जातोऽयं मम बालकः।<br>तेजसा यस्य दिव्येन चक्षूंषि मुषितानि वः॥ ३६ | मेरा यह पुत्र भगवतीकी कृपासे उत्पन्न हुआ है, जिसके अलौकिक तेजने आपलोगोंके नेत्र हर लिये हैं॥ ३६॥ |
| तस्मादौर्वं सुतं मेऽद्य याचध्वं विनयान्विताः।<br>प्रणिपातेन तुष्टोऽसौ दृष्टिं वः प्रतिमोक्ष्यति॥ ३७ | अतएव आपलोग इसी समय मेरी जंघासे उत्पन्न इस बालकसे विनम्रतापूर्वक याचना कीजिये। चरणोंमें गिरनेसे प्रसन्न होकर यह बालक आपलोगोंकी नेत्रज्योति मुक्त कर देगा॥ ३७॥ |
| व्यास उवाच | व्यासजी बोले— |
| तच्छ्रुत्वा वचनं तस्या हैहयास्तुष्टुवुश्च तम्।<br>प्रणेमुर्विनयोपेता ऊरुजं मुनिसत्तमम्॥ ३८ | उस ब्राह्मणीका वचन सुनकर हैहयोंने जंघासे उत्पन्न बालकरूप मुनिश्रेष्ठको प्रणाम किया और वे विनयसे युक्त होकर उसकी स्तुति करने लगे॥ ३८॥ |
| स सन्तुष्टो बभूवाथ तानुवाच विचक्षणः।<br>गच्छध्वं स्वगृहान्भूपा ममाख्यानकृतं वचः॥ ३९ | तत्पश्चात् प्रसन्न होकर उस बालकने उन नेत्रहीन क्षत्रियोंसे कहा—हे राजाओ! अब तुमलोग मेरी कही हुई बातपर विश्वास करके अपने घर लौट जाओ॥ ३९॥ |
| अवश्यम्भाविभावास्ते भवन्ति देवनिर्मिताः।<br>नात्र शोकस्तु कर्तव्यः पुरुषेण विजानता॥ ४० | दैवने जो विधान सुनिश्चित कर दिये हैं, वे अवश्य होकर रहते हैं; ज्ञानी व्यक्तिको इस विषयमें चिन्ता नहीं करनी चाहिये॥ ४०॥ |
| पूर्ववदृषयः सर्वे प्राप्नुवन्तु यथासुखम्।<br>व्रजन्तु विगतक्रोधा भवनानि यथासुखम्॥ ४१ | सभी ऋषिगण पूर्वकी भाँति सुख प्राप्त करें तथा सभी क्षत्रिय भी अब क्रोधरहित होकर सुखपूर्वक अपने-अपने घरोंके लिये प्रस्थान करें॥ ४१॥ |