देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
by महर्षि वेदव्यास
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
Page 806 of 889
Read in context| अ० १५] | षष्ठ स्कन्ध | ७९७ |
| :--- | :--- |
| सर्वसङ्गपरित्यागी मुनिर्भवतु तापसः।<br>निद्राक्षुधोर्विजेता च योगाभ्यासे सुनिश्चितः॥ ३७ | मुनिको चाहिये कि वह सभी आसक्तियोंका परित्याग करनेवाला, तपस्वी, निद्रा तथा भूखपर विजय प्राप्त करनेवाला और योगाभ्यासमें सम्यक् रूपसे निष्ठा रखनेवाला हो॥ ३७॥ |
| कामः क्रोधस्तथा लोभो ह्यहङ्कारश्चतुर्थकः।<br>दुर्जेया देहमध्यस्था रिपवस्तेन सर्वथा॥ ३८<br>न भूतपूर्वः संसारे न चैव वर्ततेऽधुना।<br>भविता न पुमान्कश्चिद्यो जयेत रिपूनिमान्॥ ३९ | काम, क्रोध, लोभ और चौथा अहंकार—ये शत्रु शरीरमें सदा विद्यमान रहते हैं जो सर्वथा दुर्जेय होते हैं। संसारमें न पहले कोई व्यक्ति हुआ है, न इस समय है और न तो आगे होगा जो इन शत्रुओंको जीत सके॥ ३८-३९॥ |
| न स्वर्गे न च भूलोके ब्रह्मलोके हरेः पदे।<br>कैलासे नेदृशः कश्चिद्यो जयेत रिपूनिमान्॥ ४० | न स्वर्गमें, न पृथ्वीलोकमें, न ब्रह्मलोकमें, न विष्णुलोकमें और न तो कैलासमें भी ऐसा कोई व्यक्ति है, जो इन शत्रुओंको जीत सके॥ ४०॥ |
| मुनयो ब्रह्मपुत्राश्च तथान्ये तापसोत्तमाः।<br>तेऽपि गुणत्रयाविद्धाः किं पुनर्मानवा भुवि॥ ४१ | जो मुनिगण, ब्रह्माजीके सभी पुत्र तथा अन्य श्रेष्ठ तपस्वीलोग हैं, वे भी तीनों गुणोंसे बँधे रहते हैं, तो मर्त्यलोकके मनुष्योंकी बात ही क्या ? ॥ ४१॥ |
| कपिलः सांख्यवेत्ता च योगाभ्यासरतः शुचिः।<br>तेनापि दैवयोगाद्धि प्रदग्धाः सगरात्मजाः॥ ४२ | कपिलमुनि सांख्यशास्त्रके ज्ञाता, योगाभ्यास-परायण और शुद्ध चित्तवाले थे, किंतु उन्होंने भी दैववश सगर-पुत्रोंको भस्म कर दिया॥ ४२॥ |
| तस्माद्राजन्नहङ्कारात्सञ्जातं भुवनत्रयम्।<br>कार्यकारणभावात्तु तद्वियुक्तं कथं भवेत्॥ ४३ | अतः हे राजन्! कार्य-कारणस्वरूप अहंकारसे ही यह त्रिलोक उत्पन्न हुआ है, तो फिर मनुष्य उससे वियुक्त कैसे रह सकता है? ॥ ४३॥ |
| ब्रह्मा गुणत्रयाविष्टो विष्णुश्चैवाथ शङ्करः।<br>प्रभवन्ति शरीरेषु तेषां भावाः पृथक्पृथक्॥ ४४<br>मानवानां च का वार्ता सत्त्वैकान्तव्यवस्थितौ।<br>गुणानां सङ्करो राजन्सर्वत्र समवस्थितः॥ ४५<br>कदाचित्सत्त्ववृद्धिः स्यात्कदाचिद्रजसः किल।<br>कदाचित्तमसो वृद्धिः समभावः कदाचन॥ ४६ | ब्रह्मा, विष्णु और शिव भी त्रिगुणसे बँधे हुए हैं; उनके भी शरीरोंमें गुणोंके पृथक्-पृथक् भाव उत्पन्न होते हैं। जब एकमात्र सत्त्वप्रधान देवताओंकी भी यह स्थिति है तो फिर मनुष्योंकी क्या बात? हे राजन्! गुणोंका संकर (मेल) सर्वत्र विद्यमान है। कभी सत्त्वगुणकी वृद्धि होती है, कभी रजोगुणकी वृद्धि होती है, कभी तमोगुणकी वृद्धि हो जाती है और कभी तीनों गुण बराबर हो जाते हैं॥ ४४-४६॥ |
| निर्गुणः परमात्मासौ निर्लेपः परमोऽव्ययः।<br>अलक्ष्यः सर्वसत्त्वानामप्रमेयः सनातनः॥ ४७<br>तथैव परमा शक्तिर्निर्गुणा ब्रह्मसंस्थिता।<br>दुर्ज्ञेया चाल्पमतिभिः सर्वभूतव्यवस्थितिः॥ ४८<br>परात्मनस्तथा शक्तेस्तयोरैक्यं सदैव हि।<br>अभिन्नं तद्वपुर्ज्ञात्वा मुच्यते सर्वदोषतः॥ ४९<br>तज्ज्ञानादेव मोक्षः स्यादिति वेदान्तडिण्डिमः।<br>यो वेद स विमुक्तोऽस्मिन्संसारे त्रिगुणात्मके॥ ५० | वे परमात्मा निर्गुण, निर्लेप, परम अविनाशी, सभी प्राणियोंसे अलक्ष्य, अप्रमेय और सनातन हैं। उसी प्रकार वे परमा शक्ति भी निर्गुण, ब्रह्ममें स्थित, अल्पबुद्धि प्राणियोंके द्वारा दुर्ज्ञेय, समस्त प्राणियोंकी आश्रय हैं। परमात्मा और पराशक्ति—उन दोनोंमें सदासे ऐक्य है। उनका स्वरूप अभिन्न है—यह जानकर प्राणी समस्त दोषोंसे मुक्त हो जाता है। इस ज्ञानसे मुक्ति हो जाती है—यह वेदान्तका डिंडिमघोष है। जो यह जान लेता है, वह इस त्रिगुणात्मक संसारसे मुक्त हो जाता है॥ ४७-५०॥ |