Skip to content
SarvaKosh
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

Report a copyright issue

DevanagariHindipublished889 pages

Page 804 of 889

Read in context
Page 804

| अ० १५ ] | षष्ठ स्कन्ध | ७९५ |
| :--- | :--- |

| विज्ञप्ता मुनिभिः स्तोत्रैर्निर्विण्णात्मानमब्रुवन् ।<br>प्रसन्नाः स्म महीपाल वरं वरय सुव्रत ॥ ९<br>यज्ञेनानेन राजर्षे वरं जन्म विधीयते ।<br>देवदेहं नृदेहं वा यत्ते मनसि वाञ्छितम् ॥ १०<br>दृप्तः कामं पुरोधास्ते मृत्युलोके यथासुखम् ।<br>एवमुक्तो निमेरात्मा सन्तुष्टास्तानुवाच ह ॥ ११ | दुःखी मनवाले राजासे कहा—हे राजन् ! हे सुव्रत ! हम प्रसन्न हैं; वर माँगिये। हे राजर्षे ! इस यज्ञके कारण आपको श्रेष्ठ जन्म प्राप्त हो सकता है। देवशरीर, मनुष्यशरीर अथवा आपके मनमें जो इच्छा हो, उसे आप प्राप्त कर सकते हैं; जैसे कि आपके पुरोहित वसिष्ठ गर्वयुक्त होकर मर्त्यलोकमें सुखपूर्वक रह रहे हैं ॥ ८—१० १/२ ॥<br>उनके ऐसा कहनेपर निमिकी आत्माने परम सन्तुष्ट होकर उनसे कहा—हे श्रेष्ठ देवगण ! सर्वदा विनष्ट होनेवाली इस देहमें रहनेकी मेरी इच्छा नहीं है, सम्पूर्ण प्राणियोंकी दृष्टिमें मेरा निवास हो, जिससे मैं वायुरूप होकर समस्त प्राणियोंके नेत्रोंमें विचरण करूँ ॥ ११-१२ १/२ ॥ |
| न देहे मम वाञ्छास्ति सर्वदैव विनश्वरे ।<br>वासो मे सर्वसत्त्वानां दृष्टावस्तु सुरोत्तमाः ॥ १२<br>नेत्रेषु सर्वभूतानां वायुभूतश्चराम्यहम् ।<br>एवमुक्ताः सुरास्तत्र निमेरात्मानमब्रुवन् ॥ १३ | उनसे ऐसा कहे जानेपर देवताओंने निमिकी आत्मासे कहा—हे महाराज ! आप कल्याणकारिणी तथा सबकी ईश्वरी भगवतीकी आराधना करें। आपके इस यज्ञसे प्रसन्न होकर वे आपका अभीष्ट अवश्य पूर्ण करेंगी ॥ १३-१४ ॥ |
| प्रार्थय त्वं महाराज देवीं सर्वेश्वरीं शिवाम् ।<br>मखेनानेन सन्तुष्टा सा तेऽभीष्टं विधास्यति ॥ १४ | देवताओंके ऐसा कहनेपर उन्होंने अनेक प्रकारके दिव्य स्तोत्रोंद्वारा भक्तिपूर्वक गद्गद वाणीमें देवीकी प्रार्थना की ॥ १५ ॥ |
| स देवैरेवमुक्तस्तु प्रार्थयामास देवताम् ।<br>स्तोत्रैर्नानाविधैर्दिव्यैर्भक्त्या गद्गदया गिरा ॥ १५ | तब प्रसन्न होकर देवीने उन्हें साक्षात् दर्शन दिया। उनके करोड़ों सूर्योंकी प्रभाके समान तथा लावण्यसे दीप्तिमान रूपको देखकर सभी कृतकृत्य हो गये और उनके मनमें परम प्रसन्नता हुई। हे राजन् ! देवीके प्रसन्न हो जानेपर राजाने वर माँगा—मुझे वह विमल ज्ञान दीजिये, जिससे मोक्ष प्राप्त हो जाय तथा समस्त प्राणियोंके नेत्रोंमें मेरा निवास हो जाय ॥ १६—१८ ॥ |
| प्रसन्ना सा तदा देवी प्रत्यक्षं दर्शनं ददौ ।<br>कोटिसूर्यप्रतीकाशं रूपं लावण्यदीपितम् ॥ १६<br>दृष्ट्वा प्रमुदिताः सर्वे कृतकृत्याश्च चेतसि ।<br>प्रसन्नायां देवतायां राजा वव्रे वरं नृप ॥ १७<br>ज्ञानं तद्विमलं देहि येन मोक्षो भवेदपि ।<br>नेत्रेषु सर्वभूतानां निवासो मे भवेदिति ॥ १८ | तब प्रसन्न हुई देवेश्वरी जगदम्बाने कहा—तुम्हें विमल ज्ञान प्राप्त होगा, परंतु अभी तुम्हारा प्रारब्ध शेष है। समस्त प्राणियोंके नेत्रोंमें तुम्हारा निवास भी होगा। तुम्हारे कारण ही प्राणियोंके नेत्रोंमें पलक गिरानेकी शक्ति होगी। तुम्हारे निवासके कारण ही मनुष्य, पशु तथा पक्षी 'निमिष' (पलक गिरानेवाले) तथा देवता 'अनिमिष' (पलक न गिरानेवाले) होंगे ॥ १९—२१ ॥ |
| ततः प्रसन्ना देवेशी प्रोवाच जगदम्बिका ।<br>ज्ञानं ते विमलं भूयात्प्रारब्धस्यावशेषतः ॥ १९<br>नेत्रेषु सर्वभूतानां निवासोऽपि भविष्यति ।<br>निमिषं यान्ति चक्षूंषि त्वत्कृतेनैव देहिनाम् ॥ २०<br>तव वासात्सनिमिषा मानवाः पशवस्तथा ।<br>पतङ्गाश्च भविष्यन्ति पुनश्चानिमिषाः सुराः ॥ २१ | इस प्रकार उन राजाको वर देकर और सब मुनियोंको बुलाकर वे श्रीवरदायिनी भगवती वहीं अन्तर्धान हो गयीं ॥ २२ ॥ |
| इति दत्त्वा वरं तस्मै तदा श्रीवरदेवता ।<br>आमन्त्र्य च मुनीन्सर्वांस्तत्रैवान्तर्हिताभवत् ॥ २२ | |