देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
by महर्षि वेदव्यास
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
DevanagariHindipublished889 pages
Page 801 of 889
Read in contextPage 801
७९२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १४
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| शापं च दत्तवांस्तस्मै राज्ञे मन्युवशं गतः।<br>यस्मात्त्वं मां गुरुं त्यक्त्वा कृत्वान्यं गुरुमात्मनः॥ ४१<br>दीक्षितोऽसि बलान्मन्द मामवज्ञाय पार्थिव।<br>वारितोऽपि मया तस्माद्विदेहस्त्वं भविष्यसि॥ ४२<br>पतत्विदं शरीरं ते विदेहो भव भूपते। | उन मुनिने राजाको शाप दे दिया—‘हे मूर्ख पार्थिव ! मेरे द्वारा मना किये जानेपर भी तुम मुझ गुरुका त्याग करके दूसरेको अपना गुरु बनाकर शक्तिके अभिमानमें मेरी अवहेलना करके यज्ञमें दीक्षित हो गये हो, उससे तुम विदेह हो जाओगे। हे राजन् ! तुम्हारा यह शरीर नष्ट हो जाय और तुम विदेह हो जाओ’॥ ३९–४२ ½॥ |
| व्यास उवाच<br>इति तद्व्याहृतं श्रुत्वा राज्ञस्तु परिचारकाः॥ ४३<br>सद्यः प्रबोधयामासुर्मुनिमाहुः प्रकोपितम्।<br>कुपितं तं समागत्य राजा विगतकल्मषः॥ ४४ | **व्यासजी बोले—**उनका यह शापवचन सुनकर राजाके सेवकोंने शीघ्रतासे जाकर राजाको जगाया और उन्हें बताया कि मुनि वसिष्ठ बहुत क्रोधित हो गये हैं, तब उन कुपित मुनिके पास आकर निष्पाप राजाने मधुर शब्दोंमें युक्तिपूर्ण तथा सारगर्भित वचन कहा—॥ ४३–४४ ½॥ |
| उवाच वचनं श्लक्ष्णं हेतुगर्भं च युक्तिमत्।<br>मम दोषो न धर्मज्ञ गतस्त्वं तृष्णयाकुलः॥ ४५<br>हित्वा मां यजमानं वै प्रार्थितोऽपि मया भृशम्।<br>न लज्जसे द्विजश्रेष्ठ कृत्वा कर्म जुगुप्सितम्॥ ४६<br>सन्तोषे ब्राह्मणश्रेष्ठ जानन्धर्मस्य निश्चयम्।<br>पुत्रोऽसि ब्रह्मणः साक्षाद्वेदवेदाङ्गवित्तमः॥ ४७<br>न वेत्सि विप्रधर्मस्य गतिं सूक्ष्मां दुरत्ययाम्।<br>आत्मदोषं मयि ज्ञात्वा मृषा मां शप्तुमिच्छसि॥ ४८<br>त्याज्यस्तु सुजनैः क्रोधश्चण्डालादधिको यतः।<br>वृथा क्रोधपरीतेन मयि शापः प्रपातितः॥ ४९<br>तवापि च पतत्वद्य देहोऽयं क्रोधसंयुतः। | हे धर्मज्ञ ! इसमें मेरा दोष नहीं है, आप ही लोभके वशीभूत होकर मेरे बार-बार अनुरोध करनेपर भी मुझ यजमानको छोड़कर चले गये। हे विप्रवर ! हे ब्राह्मणश्रेष्ठ ! ब्राह्मणको सदा सन्तोष रखना चाहिये—धर्मके इस सिद्धान्तको जानते हुए भी ऐसा निन्दित कर्म करके आपको लज्जा नहीं आ रही है। आप तो साक्षात् ब्रह्माजीके पुत्र और वेद-वेदांगोंके सर्वश्रेष्ठ ज्ञाता हैं तो भी आप ब्राह्मणधर्मकी अत्यन्त कठिन और सूक्ष्म गतिको नहीं जानते। अपना दोष मुझमें आरोपित करके आप मुझे व्यर्थ ही शाप देना चाहते हैं। सज्जनोंको चाहिये कि क्रोधका त्याग कर दें; क्योंकि यह चण्डालसे भी अधिक दूषित है; क्रोधके वशीभूत होकर आपने मुझे व्यर्थ ही शाप दे दिया है। अतः आपकी भी यह क्रोधयुक्त देह आज ही नष्ट हो जाय॥ ४५–४९ ½॥ |
| एवं शप्तो मुनी राज्ञा राजा च मुनिना तथा॥ ५०<br>परस्परं प्राप्य शापं दुःखितौ तौ बभूवतुः।<br>वसिष्ठस्त्वतिचिन्तार्तो ब्रह्माणं शरणं गतः॥ ५१<br>निवेदयामास तथा शापं भूपकृतं महत्। | इस प्रकार राजाके द्वारा मुनि और मुनिके द्वारा राजा शापित हो गये और दोनों एक-दूसरेसे शाप पाकर बहुत दुःखी हुए। तब वसिष्ठजी अत्यधिक चिन्तातुर होकर ब्रह्माजीकी शरणमें गये और उन्होंने राजाके द्वारा प्रदत्त कठिन शापके विषयमें उनसे निवेदन किया॥ ५०–५१ ½॥ |
| वसिष्ठ उवाच<br>राज्ञा शप्तोऽस्मि देहोऽयं पतत्वद्य तवेति वै॥ ५२<br>किं करोमि पितः प्राप्तं कष्टं कायप्रपातजम्।<br>अन्यदेहसमुत्पत्तौ जनकं वद साम्प्रतम्॥ ५३ | **वसिष्ठजी बोले—**हे पिताजी ! राजा निमिने मुझे शाप दे दिया है कि तुम्हारा यह शरीर आज ही नष्ट हो जाय। अतः शरीर नष्ट होनेसे प्राप्त कष्टके लिये मैं क्या करूँ? इस समय आप मुझे यह बतायें कि दूसरे शरीरकी प्राप्तिमें मेरे पिता कौन होंगे? हे पिताजी ! दूसरे देहसे सम्बन्ध होनेपर भी मेरी स्थिति |