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देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

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DevanagariHindipublished889 pages

Page 797 of 889

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Page 797
७८८श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १३
व्यास उवाचव्यासजी बोले—
युध्यमानावुभौ दृष्ट्वा ब्रह्मा लोकपितामहः॥ ४४<br>तत्राजगामानिमिषैर्वृतः सर्वैर्दयापरैः।<br>तावाश्वास्य जगत्कर्ता युद्धतो विनिवार्य च॥ ४५लोकपितामह ब्रह्माजी उन दोनोंको युद्ध करते देखकर समस्त दयापरायण देवताओंके साथ वहाँ आये। सृष्टिकर्ता ब्रह्माजीने उन दोनोंको समझाकर युद्धसे विरत करके परस्पर दिये गये शापसे भी मुक्त कर दिया॥ ४४-४५ १/२॥
शापं संमोचयामास तयोः क्षिप्तं परस्परम्।<br>ततो जग्मुः सुराः सर्वे स्वानि धिष्ण्यानि पद्मभूः॥ ४६<br>सत्यलोकं जगामाशु हंसारूढः प्रतापवान्।<br>विश्वामित्रोऽप्यगात्तूर्णं वसिष्ठः स्वाश्रमं गतः॥ ४७<br>मिथः स्नेहं ततः कृत्वा प्रजापत्युपदेशतः।<br>मैत्रावरुणिनाप्येवं कृतं युद्धमकारणम्॥ ४८इसके बाद सभी देवगण अपने-अपने लोकोंको चले गये, कमलयोनि प्रतापी ब्रह्माजी शीघ्र हंसपर आरूढ़ होकर सत्यलोकको चले गये और प्रजापतिके उपदेशसे परस्पर स्नेह करके विश्वामित्र तथा वसिष्ठजी भी अपने-अपने आश्रमोंको शीघ्र चले गये। हे राजन्! इस प्रकार मैत्रावरुणि वसिष्ठने भी अकारण ही विश्वामित्रके साथ परस्पर दुःखप्रद युद्ध किया था॥ ४६-४८ १/२॥
कौशिकेन समं भूप दुःखदं च परस्परम्।<br>को नाम मानवो लोके देवो वा दानवोऽपि वा॥ ४९<br>अहङ्कारजयं कृत्वा सर्वदा सुखभाग्भवेत्।<br>तस्माद्राजंश्चित्तशुद्धिर्महतामपि दुर्लभा॥ ५०<br>यत्नेन साधनीया सा तद्विहीनं निरर्थकम्।<br>तीर्थं दानं तपः सत्यं यत्किञ्चिद्धर्मसाधनम्॥ ५१इस संसारमें मनुष्य, देवता या दैत्य—कौन ऐसा है, जो अहंकारपर विजय प्राप्तकर सदा सुखी रह सके। अतः हे राजन्! चित्तकी शुद्धि महापुरुषोंके लिये भी दुर्लभ है। उसे प्रयत्नपूर्वक शुद्ध करना चाहिये; उसके बिना तीर्थयात्रा, दान, तपस्या, सत्य आदि जो कुछ भी धर्मसाधन है; वह सब निरर्थक है॥ ४९-५१॥
( श्रद्धात्र त्रिविधा प्रोक्ता सात्त्विकी राजसी तथा।<br>तामसी सर्वदेहेषु देहिनां धर्मकर्मसु॥<br>सात्त्विकी दुर्लभा लोके यथोक्तफलदा सदा।<br>तदर्धफलदा प्रोक्ता राजसी विधिसंयुता॥<br>तामसी त्वफला राजन्न तु कीर्तिकरी पुनः।<br>कामक्रोधाभिभूतानां जनानां नृपसत्तम॥ )(सबके देहोंमें तथा प्राणियोंके धर्मकर्मोंमें सात्त्विकी, राजसी और तामसी—यह तीन प्रकारकी श्रद्धा कही गयी है। इनमें यथोक्त फल देनेवाली सात्त्विकी श्रद्धा जगत्में सदा दुर्लभ होती है। विधिविधानसे युक्त राजसी श्रद्धा उसका आधा फल देनेवाली कही गयी है। हे राजन्! काम-क्रोधके वशीभूत पुरुषोंकी श्रद्धा तामसी होती है। हे नृपश्रेष्ठ! वह फलविहीन होती है और कीर्ति करनेवाली भी नहीं होती।)
वासनारहितं कृत्वा तच्चित्तं श्रवणादिना।<br>तीर्थादिषु वसेन्नित्यं देवीपूजनतत्परः॥ ५२<br>देवीनामानि वचसा गृह्णंस्तस्या गुणान्स्तुवन्।<br>ध्यायंस्तस्याः पदाम्भोजं कलिदोषभयार्दितः॥ ५३कलियुगके दोषोंसे भयभीत व्यक्तिको कथा-श्रवण आदिके द्वारा चित्तको वासनारहित करके देवीकी पूजामें तत्पर रहते हुए, वाणीसे देवीके नामोंको ग्रहण करते हुए, उनके गुणोंका कीर्तन करते हुए तथा उनके चरण-कमलका ध्यान करते हुए तीर्थ आदिमें नित्य वास करना चाहिये॥ ५२-५३॥
एवं तु कुर्वतस्तस्य न कदाचित्कलेर्भयम्।<br>अनायासेन संसारान्मुच्यते पातकी जनः॥ ५४ऐसा करनेसे उसे कभी कलियुगका भय नहीं होगा, इससे पापी प्राणी भी अनायास ही संसारसे मुक्त हो जाता है॥ ५४॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे आडीबकयुद्धवर्णनसहितं देवीमाहात्म्यवर्णनं नाम त्रयोदशोऽध्यायः॥ १३॥