देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
by महर्षि वेदव्यास
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
DevanagariHindipublished889 pages
Page 795 of 889
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| ७८६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १३ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| राजातिमुदितस्तेन विप्रानानीय सर्वतः।<br>कारयामास सम्भारान्यज्ञार्थं वेदवित्तमान्॥ १८ | इससे अत्यन्त प्रसन्न होकर राजाने वेदज्ञ ब्राह्मणोंको बुलाकर यज्ञके लिये सामग्री एकत्र करवायी॥ १८॥ |
| प्रारब्धे तु मखे तत्र विश्वामित्रो महामुनिः।<br>बद्धं दृष्ट्वा शुनःशेपं निषिषेध नृपं तदा॥ १९ | यज्ञके प्रारम्भ होनेपर महामुनि विश्वामित्रने वहाँ शुनः-शेपको बँधा देखकर राजाको मना करते हुए कहा—॥ १९॥ |
| राजन्मा साहसं कार्षीर्मुञ्चैनं द्विजबालकम्।<br>प्रार्थयाम्यहमायुष्मन् सुखं तेऽद्य भविष्यति॥ २० | हे राजन्! ऐसा साहस न कीजिये, इस ब्राह्मणबालकको छोड़ दीजिये। हे आयुष्मन्! मैं प्रार्थना करता हूँ, इससे आपको सुखकी प्राप्ति होगी॥ २०॥ |
| क्रन्दत्ययं शुनःशेपः करुणा मां दुनोत्यपि।<br>दयावान्भव राजेन्द्र कुरु मे वचनं नृप॥ २१ | यह शुनःशेप क्रन्दन कर रहा है, अतः करुणा मुझे बहुत व्यथित कर रही है। हे राजेन्द्र! मेरी बात मानिये; हे नृप! दयावान् बनिये॥ २१॥ |
| परदेहस्य रक्षायै स्वदेहं ये दयापराः।<br>ददति क्षत्रियाः पूर्वं स्वर्गकामाः शुचिव्रताः॥ २२<br><br>त्वं स्वदेहस्य रक्षार्थं हंसि द्विजसुतं बलात्।<br>पापं मा कुरु राजेन्द्र दयावान्भव बालके॥ २३ | पूर्वकालमें स्वर्गके इच्छुक, पवित्रव्रती तथा दयापरायण जो क्षत्रियगण थे, वे दूसरोंके शरीरकी रक्षाके लिये अपने प्राण दे देते थे और आप अपने शरीरकी रक्षाके लिये बलपूर्वक ब्राह्मणपुत्रका वध कर रहे हैं। हे राजेन्द्र! पाप मत कीजिये और इस बालकपर दयावान् होइए॥ २२-२३॥ |
| सर्वेषां सदृशी प्रीतिर्देहे वेत्सि स्वयं नृप।<br>मुञ्चैनं बालकं तस्मात्प्रमाणं यदि मे वचः॥ २४ | हे राजन्! अपने देहके प्रति सभीको एक-जैसी प्रीति होती है—यह बात आप स्वयं जानते हैं। यदि आप मेरी बातको प्रमाण मानते हैं तो इस बालकको छोड़ दीजिये॥ २४॥ |
| व्यास उवाच<br>अनादृत्य च तद्वाक्यं राजा दुःखातुरो भृशम्।<br>न मुमोच मुनिस्तस्मै चुकोपातीव तापसः॥ २५ | व्यासजी बोले— दुःखसे अत्यन्त पीड़ित राजाने मुनिकी बातका अनादर करके उस बालकको नहीं छोड़ा; इससे वे तपस्वी मुनि उनके ऊपर अत्यन्त क्रुद्ध हो गये॥ २५॥ |
| उपदेशं ददौ तस्मै शुनःशेपाय कौशिकः।<br>मन्त्रं पाशधरस्याथ दयावान्वेदवित्तमः॥ २६<br><br>शुनःशेपोऽपि तं मन्त्रमसकृद्वधकर्शितः।<br>प्लुतस्वरेण चुक्रोश संस्मरन्वरुणं भृशम्॥ २७ | वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ उन दयालु विश्वामित्रने शुनःशेपको पाशधारी वरुणदेवके मन्त्रका उपदेश दिया। अपने वधके भयसे व्याकुल शुनःशेप भी वरुणदेवका स्मरण करते हुए उच्च स्वरसे बार-बार मन्त्रका जप करने लगा॥ २६-२७॥ |
| स्तुवन्तं मुनिपुत्रं तं ज्ञात्वा वै यादसां पतिः।<br>तत्रागत्य शुनःशेपं मुमोच करुणार्णवः॥ २८<br><br>रोगहीनं नृपं कृत्वा वरुणः स्वगृहं ययौ।<br>विश्वामित्रस्तु तं पुत्रं कृतवान्मोचितं मृतेः॥ २९ | जलचरोंके अधिपति करुणासिन्धु वरुणदेवने वहाँ आकर स्तुति करते हुए उस ब्राह्मणपुत्र शुनः-शेपको छुड़ा दिया और राजाको रोगमुक्त करके वे वरुणदेव अपने लोकको चले गये। विश्वामित्रने उस बालकको मृत्युसे मुक्ति प्रदान कर दी॥ २८-२९॥ |