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देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

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DevanagariHindipublished889 pages

Page 786 of 889

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Page 786
अ० ११ ]षष्ठ स्कन्ध७७७
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
द्वापरे च विशेषेण न्यूना सत्ययुगस्थितिः।<br>पूर्वं ये राक्षसा राजन् ते कलौ ब्राह्मणाः स्मृताः॥ ४२जो धर्मकी स्थिति थी, वह द्वापरमें विशेषरूपसे कम हो गयी। हे राजन्! पूर्वयुगोंमें जो राक्षस समझे जाते थे, वे ही कलियुगमें ब्राह्मण माने जाते हैं॥ ४१-४२॥
पाखण्डनिरताः प्रायो भवन्ति जनवञ्चकाः।<br>असत्यवादिनः सर्वे वेदधर्मविवर्जिताः॥ ४३<br>दाम्भिका लोकचतुरा मानिनो वेदवर्जिताः।<br>शूद्रसेवापराः केचिन्नानाधर्मप्रवर्तकाः॥ ४४<br>वेदनिन्दाकराः क्रूरा धर्मभ्रष्टातिवादुकाः।<br>यथा यथा कलिर्वृद्धिं याति राजंस्तथा तथा॥ ४५<br>धर्मस्य सत्यमूलस्य क्षयः सर्वात्मना भवेत्।<br>तथैव क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्च धर्मवर्जिताः॥ ४६<br>असत्यवादिनः पापास्तथा वर्णेतराः कलौ।<br>शूद्रधर्मरता विप्राः प्रतिग्रहपरायणाः॥ ४७वे प्रायः पाखण्डी, लोगोंको ठगनेवाले, झूठ बोलनेवाले तथा वेद और धर्मसे दूर रहनेवाले होते हैं। उनमेंसे कुछ तो दम्भी, लोकव्यवहारमें चालाक, अभिमानी, वेदप्रतिपादित मार्गसे हटकर चलनेवाले, शूद्रोंकी सेवा करनेवाले, विभिन्न धर्मोंका प्रवर्तन करनेवाले, वेदनिन्दक, क्रूर, धर्मभ्रष्ट और व्यर्थ वाद-विवादमें लगे रहनेवाले होते हैं। हे राजन्! जैसे-जैसे कलियुगकी वृद्धि होती है, वैसे-वैसे सत्यमूलक धर्मका सर्वथा क्षय होता जाता है और वैसे ही क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और इतर वर्णोंके लोग भी धर्महीन, मिथ्यावादी तथा पापी होते हैं। ब्राह्मण शूद्रधर्ममें संलग्न और प्रतिग्रहपरायण हो जाते हैं॥ ४३-४७॥
भविष्यन्ति कलौ राजन् युगे वृद्धिं गताः किल।<br>कामचाराः स्त्रियः कामलोभमोहसमन्विताः॥ ४८<br>पापा मिथ्याभिवादिन्यः सदा क्लेशरता नृप।<br>स्वभर्तृवञ्चका नित्यं धर्मभाषणपण्डिताः॥ ४९हे राजन्! कलियुगका प्रभाव और बढ़नेपर स्त्रियाँ स्वेच्छाचारिणी तथा काम, लोभ और मोहसे युक्त हो जायेंगी। हे राजन्! वे पापाचारिणी, झूठ बोलनेवाली, सदा कलह करनेवाली, अपने पतिको ठगनेवाली और नित्य धर्मका भाषण करनेमें निपुण होंगी। कलियुगमें इस प्रकारकी पापपरायण स्त्रियाँ होती हैं॥ ४८-४९ १/२॥
भवन्त्येवंविधा नार्यः पापिष्ठाश्च कलौ युगे।<br>आहारशुद्ध्या नृपते चित्तशुद्धिस्तु जायते॥ ५०<br>शुद्धे चित्ते प्रकाशः स्याद्धर्मस्य नृपसत्तम।<br>वृत्तसङ्करदोषेण जायते धर्मसङ्करः॥ ५१<br>धर्मस्य सङ्करे जाते नूनं स्याद्वर्णसङ्करः।<br>एवं कलियुगे भूप सर्वधर्मविवर्जिते॥ ५२<br>स्ववर्णधर्मवार्तैषा न कुत्राप्युपलभ्यते।<br>महान्तोऽपि च धर्मज्ञा अधर्मं कुर्वते नृप॥ ५३<br>कलिस्वभाव एवैष परिहार्यो न केनचित्।<br>तस्मादत्र मनुष्याणां स्वभावात्पापकारिणाम्॥ ५४<br>निष्कृतिर्न हि राजेन्द्र सामान्योपायतो भवेत्।हे राजन्! आहारकी शुद्धिसे ही अन्तःकरणकी शुद्धि होती है और हे नृपश्रेष्ठ! चित्त शुद्ध होनेपर ही धर्मका प्रकाश होता है। आचारसंकरता (दूसरे वर्णोंके अनुसार आचरण)-दोषसे धर्ममें व्यतिक्रम (विकार) उत्पन्न होता है और धर्ममें विकृति होनेपर वर्णसंकरता उत्पन्न होती है। हे राजन्! इस प्रकार सभी धर्मोंसे हीन कलियुगमें अपने-अपने वर्णाश्रम-धर्मकी चर्चा भी कहीं नहीं सुनायी देती। हे राजन्! धर्मज्ञ और श्रेष्ठजन भी अधर्म करने लग जाते हैं। यह कलियुगका स्वभाव ही है; किसीके भी द्वारा इसका प्रतीकार नहीं किया जा सकता। अतः हे राजेन्द्र! इस कालमें स्वभावसे ही पाप करनेवाले मनुष्योंकी निष्कृति सामान्य उपायसे नहीं हो सकती॥ ५०-५४ १/२॥