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देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

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DevanagariHindipublished889 pages

Page 781 of 889

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Page 781

| ७७२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १० |
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| प्रारब्धं कर्म विज्ञेयं भोगात्तस्य क्षयः स्मृतः।<br>प्राणिभिः खलु भोक्तव्यं प्रारब्धं नात्र संशयः ॥ १४<br><br>पुरा कृतानि राजेन्द्र ह्यशुभानि शुभानि च।<br>अवश्यमेव कर्माणि भोक्तव्यानीति निश्चयः ॥ १५<br><br>देवैर्मनुष्यैरसुरैर्यक्षगन्धर्वकिन्नरैः ।<br>कर्मैव हि महाराज देहारम्भस्य कारणम् ॥ १६ | प्रारब्ध कर्म उसे जानना चाहिये, जिसका भोगसे क्षय हो जाता है। प्राणियोंको यहाँ प्रारब्ध कर्म अवश्य भोगना पड़ता है; इसमें सन्देह नहीं है। हे राजेन्द्र! देवता, मनुष्य, असुर, यक्ष, गन्धर्व और किन्नर—इन सभीको पूर्वकालमें किये गये शुभ-अशुभ कर्मोंका फल भोगना पड़ता है—यह निश्चित है। हे महाराज! सबके देह-धारणका कारण उनका कर्म ही होता है। कर्मके समाप्त हो जानेपर प्राणियोंका जन्म लेना भी समाप्त हो जाता है—इसमें सन्देह नहीं है॥ १४–१६ १/२ ॥ |
| कर्मक्षये जन्मनाशः प्राणिनां नात्र संशयः।<br>ब्रह्मा विष्णुस्तथा रुद्र इन्द्राद्याश्च सुरास्तथा ॥ १७<br><br>दानवा यक्षगन्धर्वाः सर्वे कर्मवशाः किल।<br>अन्यथा देहसम्बन्धः कथं भवति भूपते ॥ १८<br><br>कारणं यस्तु भोगस्य देहिनः सुखदुःखयोः।<br>तस्मादनेकजन्मोत्थसञ्चितानां च कर्मणाम् ॥ १९<br><br>मध्ये वेगः समायाति कस्यचित्कालपाकतः।<br>तत्प्रारब्धवशात्पुण्यं करोति च यथा तथा ॥ २० | हे राजन्! ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, इन्द्र आदि देवता, दानव, यक्ष और गन्धर्व—ये सभी कर्मके वशीभूत हैं, अन्यथा जीवके सुख-दुःखमें भोगका जो कारणरूप देहसम्बन्ध है वह कैसे होता? इसीलिये किसी कालविपाकके योगसे यथासमय अनेक जन्मोंमें किये हुए संचित कर्मोंका प्रभाव प्रकट हो जाता है। उसी प्रारब्धकर्मके वशमें होकर ही मनुष्य पुण्य या पाप करता है, उसी प्रकार देवता आदि भी करते हैं॥ १७–२० १/२ ॥ |
| पापं करोति मनुजस्तथा देवादयोऽपि च।<br>तथा नारायणो राजन्नरश्च धर्मजावुभौ ॥ २१<br><br>जातौ कृष्णार्जुनौ काममंशौ नारायणस्य तौ।<br>पुराणपीठिकेयं वै मुनिभिः परिकीर्तिता ॥ २२ | हे राजन्! भगवान् विष्णुके अंशसे धर्मपुत्र नर और नारायण ही कृष्ण और अर्जुनके रूपमें प्रकट हुए। मुनियोंके द्वारा इस पौराणिक आख्यानका विवेचन किया गया है॥ २१–२२ ॥ |
| देवांशः स तु विज्ञेयो यो भवेद्विभवाधिकः।<br>नानृषिः कुरुते काव्यं नारुद्रो रुद्रमर्चते ॥ २३<br><br>नादेवांशो ददात्यन्नं नाविष्णुः पृथिवीपतिः।<br>इन्द्रादग्नेर्यमाद्विष्णोर्धनदादिति भूपते ॥ २४<br><br>प्रभुत्वं च प्रभावं च कोपं चैव पराक्रमम्।<br>आदाय क्रियते नूनं शरीरमिति निश्चयः ॥ २५ | जो अधिक वैभवशाली होता है उसे देवांश जानना चाहिये। जो ऋषि नहीं है वह काव्यकी रचना नहीं कर सकता; जो रुद्र नहीं है वह रुद्रकी अर्चना नहीं कर सकता। जिसमें देवांश नहीं है वह अन्नदान नहीं कर सकता और जिसमें विष्णुका अंश नहीं है वह राजा नहीं हो सकता। हे राजन्! विष्णु, इन्द्र, अग्नि, यम और कुबेरसे प्रभुत्व, प्रभाव, कोप और पराक्रम प्राप्त करके ही निश्चितरूपसे यह शरीर बनता है॥ २३–२५ ॥ |
| यः कश्चिद्बलवाँल्लोके भाग्यवानथ भोगवान्।<br>विद्यावान्दानवान्वापि स देवांशः प्रपठ्यते ॥ २६ | इस संसारमें जो कोई बलवान्, भाग्यवान्, भोगवान्, विद्यावान् या दानशील है, उसे देवांश कहा जाता है॥ २६ ॥ |
| तथैवैते मयाख्याताः पाण्डवाः पृथिवीपते।<br>देवांशो वासुदेवोऽपि नारायणसमद्युतिः ॥ २७ | हे राजन्! उसी प्रकार मैंने पाण्डवोंको भी देवांश बताया था। वासुदेव श्रीकृष्ण तो नारायणके अंश और उन्हींके समान कान्तियुक्त थे॥ २७ ॥ |


1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—25 D