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देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

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DevanagariHindipublished889 pages

Page 777 of 889

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Page 777
७६८श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ९

| पश्चाद् ब्रवीम्यहं राजन् ज्ञात्वा सत्येन यन्त्रितम्।<br>कृते चेद्वाञ्छिते भूप सदा ते वशवर्तिनी ॥ ३१<br>भविष्यामि तुराषाड् वै सत्यमेतद्वचो मम।<br><br>नहुष उवाच<br>अवश्यमेव कर्तव्यं वचनं तव सुन्दरि ॥ ३२<br>शपामि सुकृतेनाहं यज्ञदानकृतेन वै।<br><br>शच्युवाच<br>इन्द्रस्य हरयो वाहा गजश्चैव रथस्तथा ॥ ३३<br>गरुडो वासुदेवस्य यमस्य महिषस्तथा।<br>वृषभः शङ्करस्यापि ब्रह्मणो वरटापतिः ॥ ३४<br>मयूरः कार्तिकेयस्य गजास्यस्य तु मूषकः।<br>इच्छाम्यहमपूर्वं वै वाहनं ते सुराधिप ॥ ३५<br>यन्न विष्णोर्न रुद्रस्य नासुराणां न रक्षसाम्।<br>वहन्तु त्वां महाराज मुनयः संशितव्रताः ॥ ३६<br>सर्वे शिबिकया राजन्नेतद्धि मम वाञ्छितम्।<br>सर्वदेवाधिकं त्वां वै जानामि वसुधाधिप ॥ ३७<br>तेन ते तेजसो वृद्धिं वाञ्छाम्यहमतन्द्रिता।<br><br>व्यास उवाच<br>तस्यास्तद्वचनं श्रुत्वा प्रहस्य ज्ञानदुर्बलः ॥ ३८<br>मोहितस्तु महादेव्या कृतमोहेन तत्क्षणम्।<br>उवाच वचनं भूपः संस्तुवन्वासवप्रियाम् ॥ ३९<br><br>नहुष उवाच<br>सत्यमुक्तं त्वया तन्वि वाहनं रुचिरं मम।<br>करिष्यामि सुकेशान्ते वचनं तव सर्वथा ॥ ४०<br>न ह्यल्पवीर्यो भवति यो वाहान्कुरुते मुनीन्।<br>अहमारुह्य यानेन त्वामेष्यामि शुचिस्मिते ॥ ४१<br>सप्तर्षयो मां वक्ष्यन्ति सर्वे देवर्षयस्तथा।<br>समर्थं त्रिषु लोकेषु ज्ञात्वा मां तपसाधिकम् ॥ ४२<br><br>व्यास उवाच<br>इत्युक्त्वा तां सुसन्तुष्टो विससर्ज हरिप्रियाम्।<br>मुनीनाहूय सर्वांस्तानित्युवाच स्मरान्वितः ॥ ४३ | हे राजन्! मेरी उस अभिलाषाको पूर्ण कर देनेपर मैं सदाके लिये आपकी वशवर्तिनी हो जाऊँगी। हे इन्द्र! यह मेरा सत्यवचन है॥ २९-३१½॥<br><br>**नहुष बोला—**हे सुन्दरि! मैं यज्ञ, दान आदि कृत्योंसे संचित पुण्यकी शपथ लेकर कहता हूँ कि मैं तुम्हारे वचनका अवश्य पालन करूँगा॥ ३२½॥<br><br>**शची बोलीं—**इन्द्रके वाहन अश्व, गज और रथ हैं। भगवान् विष्णुका वाहन गरुड़, यमराजका वाहन महिष, शिवका वाहन वृषभ, ब्रह्माका वाहन हंस, कार्तिकेयका वाहन मयूर और गजाननका वाहन मूषक है। हे सुराधिप! मैं चाहती हूँ कि आपका वाहन ऐसा विलक्षण हो जो विष्णु, रुद्र, असुरों तथा राक्षसोंके भी पास न हो ॥ ३३-३५½॥<br>हे महाराज! अपने व्रतमें अटल रहनेवाले समस्त मुनिगण शिबिका (पालकी)-में आपको ढोयें—हे राजन्! यही मेरी इच्छा है। हे पृथ्वीपते! मैं आपको सभी देवताओंसे महान् समझती हूँ; इसीलिये मैं सावधान रहती हुई आपके तेजकी वृद्धि चाहती हूँ॥ ३६-३७½॥<br><br>**व्यासजी बोले—**उनकी यह बात सुनकर महादेवीद्वारा प्रकट किये गये मोहसे मोहित हुआ बुद्धिहीन राजा नहुष हँसकर इन्द्रप्रिया शचीको सन्तुष्ट करते हुए यह वचन कहने लगा— ॥ ३८-३९॥<br><br>**नहुष बोला—**हे तन्वंगि! तुमने सत्य ही कहा है, यह वाहन मुझे भी रुचिकर है। हे सुन्दर केशपाशवाली! मैं तुम्हारे वचनोंका सम्यक् रूपसे पालन करूँगा॥ ४०॥<br>हे पवित्र मुसकानवाली! जो अल्प पराक्रमवाला होता है, वही ऋषियोंको पालकी ढोनेमें नहीं लगा सकता; मैं [तुम्हारी इच्छाके अनुसार] वाहनपर आरूढ़ होकर तुम्हारे पास आऊँगा॥ ४१॥<br>मुझे तीनों लोकोंमें सबसे बड़ा तपस्वी और समर्थ जानकर सप्तर्षि तथा सभी देवर्षि मेरा वहन करेंगे॥ ४२॥<br><br>**व्यासजी बोले—**ऐसा कहकर परम सन्तुष्ट उस नहुषने उन इन्द्रप्रिया शचीको विदा किया, इसके बाद सभी मुनियोंको बुलाकर वह कामातुर उनसे इस प्रकार कहने लगा— ॥ ४३॥ |