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देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

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DevanagariHindipublished889 pages

Page 763 of 889

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Page 763
७५४श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ७

| देवीं सम्पूजयामास यत्प्रसादाद्धतो रिपुः।<br>प्रसादयामास तदा स्तोत्रैर्नानाविधैरपि॥ ६२ | पूजा की तथा विविध स्तोत्रोंसे उन्हें प्रसन्न किया, जिनकी कृपासे शत्रु मारा गया॥ ६०–६२॥ |
| देवोद्याने पराशक्तेः प्रासादमकरोद्धरिः।<br>पद्मरागमयीं मूर्तिं स्थापयामास वासवः॥ ६३<br><br>त्रिकालं महतीं पूजां चक्रुः सर्वेऽपि निर्जराः।<br>तदाप्रभृति देवानां श्रीदेवी कुलदैवतम्॥ ६४ | तत्पश्चात् इन्द्रने देवोद्यान नन्दनवनमें पराशक्ति भगवतीका मन्दिर बनवाया और उसमें पद्मराग मणियोंसे निर्मित मूर्तिकी स्थापना की और सभी देवता भी तीनों समय उनकी महती पूजा करने लगे; तभीसे श्रीदेवी ही उन देवताओंकी कुलदेवी हो गयीं॥ ६३-६४॥ |
| विष्णुं त्रिभुवनश्रेष्ठं पूजयामास वासवः।<br>ततो हते महावीर्ये वृत्रे देवभयङ्करे॥ ६५<br><br>प्रववौ च शिवो वायुर्जहृषुर्दैवतास्तथा।<br>हते तस्मिन्सगन्धर्वा यक्षराक्षसकिन्नराः॥ ६६ | तब महापराक्रमी और देवताओंके लिये भयंकर वृत्रके मारे जानेपर इन्द्रने तीनों लोकोंमें श्रेष्ठ भगवान् विष्णुकी पूजा की। उस वृत्रासुरके मर जानेपर कल्याणकारी वायु बहने लगी तथा देवता, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस और किन्नरगण हर्षित हो उठे॥ ६५-६६॥ |
| इत्थं वृत्रः पराशक्तिप्रवेशयुतफेनतः।<br>तया कृतविमोहाच्च शक्रेण सहसा हतः॥ ६७<br><br>ततो वृत्रनिहन्त्रीति देवी लोकेषु गीयते।<br>शक्रेण निहतत्वाच्च शक्रेण हत उच्यते॥ ६८ | इस प्रकार भगवती पराशक्तिके समुद्रफेनसे संयुक्त होने और उनके द्वारा ही विमोहित किये जानेके कारण वृत्रासुर सहसा इन्द्रके द्वारा मारा गया। इसलिये वे भगवती देवी संसारमें 'वृत्रनिहन्त्री' इस नामसे विख्यात हुईं और वह वृत्रासुर चूँकि प्रकटरूपसे इन्द्रके द्वारा मारा गया था, इसलिये उसे इन्द्रके द्वारा मारा गया, ऐसा कहा जाता है॥ ६७-६८॥ |

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे छद्मनेन्द्रेण फेनद्वारा पराशक्तिस्मरणपूर्वकं वृत्रहननवर्णनं नाम षष्ठोऽध्यायः॥ ६॥


अथ सप्तमोऽध्यायः

त्वष्टाका वृत्रासुरकी पारलौकिक क्रिया करके इन्द्रको शाप देना, इन्द्रको ब्रह्महत्या लगना, नहुषका स्वर्गाधिपति बनना और इन्द्राणीपर आसक्त होना

व्यास उवाचव्यासजी बोले—
अथ तं पतितं दृष्ट्वा विष्णुर्विष्णुपुरीं ययौ।<br>मनसा शङ्कमानस्तु तस्य हत्याकृतं भयम्॥ १इस प्रकार उसे गिरा हुआ देखकर मन-ही-मन हत्याके भयसे सशंकित भगवान् विष्णु वैकुण्ठलोकको चले गये॥ १॥
इन्द्रोऽपि भयसंत्रस्तो ययाविन्द्रपुरीं ततः।<br>मुनयो भयसंविग्ना ह्यभवन्निहते रिपौ॥ २<br><br>किमस्माभिः कृतं पापं यदसौ वञ्चितः किल।<br>मुनिशब्दो वृथा जातः सुरेशस्य च सङ्गमात्॥ ३तत्पश्चात् इन्द्र भी भयभीत होकर इन्द्रपुरीको चल दिये। उस शत्रु (वृत्रासुर)-के मारे जानेपर मुनिगण भी भयग्रस्त हो गये कि हमने छलपूर्ण यह कैसा पापकृत्य कर डाला। इन्द्रका साथ देनेसे हमारा 'मुनि' नाम व्यर्थ हो गया॥ २-३॥
अस्माकं वचनाद् वृत्रो विश्वासमगमत्किल।<br>विश्वासघातिनः सङ्गाद्वयं विश्वासघातकाः॥ ४हमारी ही बातोंसे वृत्रासुरको विश्वास आया; विश्वासघातीके संगसे हम सब भी विश्वासघाती हो गये॥ ४॥