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देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

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DevanagariHindipublished889 pages

Page 758 of 889

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Page 758
अ० ६ ]षष्ठ स्कन्ध७४९

| देवा ऊचुः | देवता बोले— आप देवताओंके लिये अत्यन्त दुःखदायी इस शत्रु वृत्रासुरको विमोहित कर दीजिये। उसे आप ऐसा विमोहित कर दें, जिससे वह देवताओंपर विश्वास करने लगे और हमारे आयुधमें इतनी शक्ति भर दीजिये, जिससे यह शत्रु मारा जा सके॥ ५७-५८॥ |
| मोहयैनं रिपुं वृत्रं देवानामतिदुःखदम्॥ ५७ | |
| यथा विश्वसते देवांस्तथा कुरु विमोहितम्। | |
| आयुधे च बलं देहि हतः स्याद्येन वा रिपुः॥ ५८ | |
| व्यास उवाच | व्यासजी बोले— तब 'तथास्तु'—ऐसा कहकर भगवती वहीं अन्तर्धान हो गयीं और देवता भी प्रसन्न होकर अपने-अपने भवनोंको चले गये॥ ५९॥ |
| तथेत्युक्त्वा भगवती तत्रैवान्तरधीयत। | |
| स्वानि स्वानि निकेतानि जग्मुर्देवा मुदान्विताः॥ ५९ | |

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे देवीसमाराधनाय देवकृतस्तुतिवर्णनं नाम पञ्चमोऽध्यायः॥ ५॥


अथ षष्ठोऽध्यायः

भगवान् विष्णुका इन्द्रको वृत्रासुरसे सन्धिका परामर्श देना, ऋषियोंकी मध्यस्थतासे इन्द्र और वृत्रासुरमें सन्धि, इन्द्रद्वारा छलपूर्वक वृत्रासुरका वध

व्यास उवाचव्यासजी बोले— इस प्रकार वरप्राप्त उन देवता और तपस्वी ऋषिगणोंने (परस्पर मन्त्रणा करके वृत्रासुरके उत्तम आश्रमके लिये प्रस्थान किया) वहाँ तेजसे प्रकाशमान वृत्रासुरको देखा, जो तीनों लोकोंको भस्मसात् करने और देवताओंको निगल जानेके लिये उद्यत प्रतीत होता था। ऋषियोंने वृत्रासुरके समीप जाकर देवताओंकी कार्य-सिद्धिके लिये उससे सामनीतिपूर्ण तथा रसमय प्रिय वचन कहा॥ १-२ ½॥
एवं प्राप्तवरा देवा ऋषयश्च तपोधनाः।<br>( जग्मुः सर्वे च सम्मन्त्र्य वृत्रस्याश्रममुत्तमम् ।)<br>ददृशुस्तत्र तं वृत्रं ज्वलन्तमिव तेजसा॥ १
धक्ष्यन्तमिव लोकांस्त्रीन्ग्रसन्तमिव चामरान्।<br>ऋषयोऽथ ततोऽभ्येत्य वृत्रमूचुः प्रियं वचः॥ २
देवकार्यार्थसिद्धयर्थं सामयुक्तं रसात्मकम्।
ऋषय ऊचुःऋषि बोले— सब लोकोंके लिये भयंकर हे महाभाग वृत्रासुर! आपने इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्डको व्याप्त कर लिया है, परंतु इन्द्रके साथ आपका वैर आपके सुखको नष्ट करनेवाला है। यह आप दोनोंके लिये दुःखद और चिन्ता बढ़ानेका परम कारण है। न आप सुखसे सो पाते हैं, न ही इन्द्र सन्तुष्ट होकर सोते हैं; क्योंकि आप दोनोंको शत्रु-जन्य भय बना रहता है। आप दोनोंको युद्ध करते हुए भी बहुत समय व्यतीत हो गया है; इससे देवताओं, राक्षसों तथा मनुष्योंसहित समस्त प्रजाको कष्ट हो रहा है॥ ३-६ ½॥
वृत्र वृत्र महाभाग सर्वलोकभयङ्कर॥ ३
व्याप्तं त्वयैतत्सकलं ब्रह्माण्डमखिलं किल।<br>शक्रेण तव वैरं यत्तत्तु सौख्यविघातकम्॥ ४
युवयोर्दुःखदं कामं चिन्तावृद्धिकरं परम्।<br>न त्वं स्वपिषि सन्तुष्टो न चापि मघवा तथा॥ ५
सुखं स्वपिति चिन्तार्तो द्वयोर्यद्वैरिजं भयम्।<br>युवयोर्युध्यतोः कालो व्यतीतस्तु महानिह॥ ६
पीड्यन्ते च प्रजाः सर्वाः सदेवासुरमानवाः।