देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
by महर्षि वेदव्यास
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
DevanagariHindipublished889 pages
Page 755 of 889
Read in contextPage 755
| ७४६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ५ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| त्वं सर्वविश्वजननी परिपालयास्मान्<br>पुत्रानिवातिपतितान् रिपुसङ्कटेऽस्मिन् ।<br>मातर्न तेऽस्त्यविदितं भुवनत्रयेऽपि<br>कस्मादुपेक्षसि सुरानसुरप्रतप्तान् ॥ ३५ | हे माता! आप समस्त विश्वकी जननी हैं, शत्रुद्वारा उपस्थित किये गये इस संकटमें पड़े हुए हम सबका आप पुत्रोंके समान परिपालन कीजिये। आपसे तीनों लोकोंमें कुछ भी अज्ञात नहीं है, तो आप असुरोंके द्वारा पीड़ित देवताओंकी उपेक्षा क्यों कर रही हैं?॥ ३५॥ |
| त्रैलोक्यमेतदखिलं विहितं त्वयैव<br>ब्रह्मा हरिः पशुपतिस्तव वासनोत्थाः।<br>कुर्वन्ति कार्यमखिलं स्ववशा न ते ते<br>भ्रूभङ्गचालनवशाद्विहरन्ति कामम् ॥ ३६ | आपने ही इस सम्पूर्ण त्रिलोकीकी रचना की है। ब्रह्मा, विष्णु और शिव आपके ही संकल्पसे उत्पन्न हुए हैं। आपके भृकुटि-विलासमात्रसे वे [सृजन, पालन तथा संहार] समस्त कार्य करते हैं और यथेच्छ विहार करते हैं; वे भी स्वतन्त्र नहीं हैं॥ ३६॥ |
| माता सुतान्यरिभवात्परिपाति दीनान्<br>रीतिस्त्वयैव रचिता प्रकटापराधान्।<br>कस्मान्न पालयसि देवि विनापराधा-<br>नस्मांस्त्वदङ्घ्रिशरणान्करुणारसाब्धे ॥ ३७ | हे देवि! माता प्रत्यक्ष अपराधवाले अपने दुःखी पुत्रोंकी भी कष्टसे सब प्रकारसे रक्षा करती है—यह रीति आपके ही द्वारा निर्मित है; तब हे करुणारसकी समुद्रस्वरूपिणि! आप अपने चरणोंकी शरणमें पड़े हुए हम निरपराध देवताओंका पालन क्यों नहीं कर रही हैं?॥ ३७॥ |
| नूनं मदङ्घ्रिभजनाप्तपदाः किलैते<br>भक्तिं विहाय विभवे सुखभोगलुब्धाः।<br>नेमे कटाक्षविषया इति चेन्न चैषा<br>रीतिः सुते जननकर्तरि चापि दृष्टा ॥ ३८ | हे जननि! यदि आप सोचती हों कि मेरे चरणकमलोंकी आराधनासे राज्य प्राप्त करके देवता मेरी भक्ति छोड़कर वैभव-सुखोंके भोगमें आसक्त हो जायेंगे और इन्हें मेरे कृपाकटाक्षकी आवश्यकता नहीं रह जायगी तो ऐसा सामान्यतः होता ही है, फिर भी जन्म देनेवाली माता अपने पुत्रके प्रति ऐसी भावना रखे—यह रीति कहीं देखी नहीं गयी॥ ३८॥ |
| दोषो न नोऽत्र जननि प्रतिभाति चित्ते<br>यत्ते विहाय भजनं विभवे निमग्नाः।<br>मोहस्त्वया विरचितः प्रभवत्यसौ न-<br>स्तस्मात्स्वभावकरुणे दयसे कथं न॥ ३९ | हे जननि! आपका भजन त्यागकर हमलोग जो भोगमें निमग्न हैं—इसमें हमारे चित्तमें अपना दोष नहीं प्रतीत होता; क्योंकि मोहकी रचना आपने ही की है और वह हमलोगोंको मोहित कर देता है। ऐसी परिस्थितिमें हे करुणामय स्वभाववाली! आप हमपर दया क्यों नहीं करतीं?॥ ३९॥ |
| पूर्वं त्वया जननि दैत्यपतिर्बलिष्ठो<br>व्यापादितो महिषरूपधरः किलाजौ।<br>अस्मत्कृते सकललोकभयावहोऽसौ<br>वृत्रं कथं न भयदं विधुनोषि मातः॥ ४० | हे जननि! पूर्वकालमें आपने हमलोगोंके कल्याणार्थ सभीके लिये भयकारी महिषरूप धारण करनेवाले बलवान् दैत्यराजका वध किया था। हे माता! भय प्रदान करनेवाले वृत्रासुरका भी वध आप क्यों नहीं करतीं?॥ ४०॥ |