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देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

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DevanagariHindipublished889 pages

Page 749 of 889

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Page 749
७४०श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ४
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
एवं युद्धे वर्तमाने दारुणे लोमहर्षणे।<br>शक्रं जग्राह सहसा वृत्रः क्रोधसमन्वितः॥ २८इस प्रकारके हो रहे रोमांचकारी और भयंकर संग्राममें क्रोधाभिभूत वृत्रासुरने अचानक इन्द्रको पकड़ लिया॥ २८॥
अपावृत्य मुखे क्षिप्त्वा स्थितो वृत्रः शतक्रतुम्।<br>मुदितोऽभून्महाराज पूर्ववैरमनुस्मरन्॥ २९हे महाराज! वृत्रासुर इन्द्रको कवच-वस्त्र आदिसे रहित करके अपने मुखमें डालकर स्थित हो गया और पूर्ववैरका स्मरण करते हुए वह अत्यन्त प्रसन्न हुआ॥ २९॥
शक्रे ग्रस्तेऽथ वृत्रेण संभ्रान्ता निर्जरास्तदा।<br>चुक्रुशुः परमार्तास्ते हा शक्रेति मुहुर्मुहुः॥ ३०वृत्रासुरके द्वारा इन्द्रको निगला गया देखकर देवता विस्मित हो गये और अत्यन्त दुःखी होकर 'हा इन्द्र! हा इन्द्र!' कहकर चिल्लाने लगे॥ ३०॥
अपावृतं मुखे शक्रं ज्ञात्वा सर्वे दिवौकसः।<br>बृहस्पतिं प्रणम्योचुर्दीना व्यथितचेतसः॥ ३१जब देवताओंको यह ज्ञात हुआ कि इन्द्रको वृत्रने मुखमें रखकर छिपा लिया है तो वे अत्यन्त दुःखित होकर बृहस्पतिके पास गये और उनसे दीन वाणीमें बोले—॥ ३१॥
किं कर्तव्यं द्विजश्रेष्ठ त्वमस्माकं गुरुः परः।<br>शक्रो ग्रस्तस्तु वृत्रेण रक्षितो देवतान्तरैः॥ ३२हे द्विजश्रेष्ठ! देवसेनासे सुरक्षित इन्द्रको वृत्रासुरने अपने मुखमें रख लिया है। अब हम क्या करें? आप हमारे परम गुरु हैं॥ ३२॥
विना शक्रेण किं कुर्मः सर्वे हीनपराक्रमाः।<br>अभिचारं कुरु विभो सत्वरः शक्रमुक्तये॥ ३३इन्द्रके बिना हमलोग क्या करें, हम सब पराक्रमहीन हो गये हैं। हे विभो! इन्द्रकी मुक्तिके लिये आप शीघ्र ही अभिचार-क्रिया कीजिये॥ ३३॥
बृहस्पतिरुवाच<br>किं कर्तव्यं सुराः क्षिप्तो मुखमध्येऽस्ति वासवः।<br>वृत्रेणोत्सादितो जीवन्नस्ति कोष्ठान्तरे रिपोः॥ ३४बृहस्पति बोले—हे देवताओ! क्या किया जाय? उसने इन्द्रको मुखमें रख लिया है, वृत्रासुरके द्वारा पीड़ित वे इन्द्र उस शत्रुके मुखमें भी जीवित हैं॥ ३४॥
व्यास उवाच<br>देवाश्चिन्तातुराः सर्वे तुरासाहं तथाकृतम्।<br>दृष्ट्वा विमृश्य तरसा चक्रुर्यत्नं विमुक्तये॥ ३५व्यासजी बोले—इन्द्रको उस स्थितिमें प्राप्त देखकर चिन्तित देवताओंने भलीभाँति सोचकर उनकी मुक्तिके लिये शीघ्र ही एक उपाय किया॥ ३५॥
असृजन्त महासत्त्वां जृम्भिकां रिपुनाशिनीम्।<br>ततो विजृम्भमाणः स व्यावृतास्यो बभूव ह॥ ३६उन्होंने अत्यन्त शक्तिशाली और शत्रुनाशिनी जम्हाईका सृजन किया; इससे उसे जम्हाई आते ही उस वृत्रासुरका मुख खुल गया॥ ३६॥
विजृम्भमाणस्य ततो वृत्रस्यास्यादवापतत्।<br>स्वान्यङ्गान्यपि संक्षिप्य निष्क्रान्तो बलसूदनः॥ ३७तत्पश्चात् जम्हाई लेते हुए वृत्रासुरके मुखसे बल नामक दैत्यका नाश करनेवाले इन्द्र अपने अंगोंको संकुचित करके बाहर निकल आये॥ ३७॥
ततः प्रभृति लोकेषु जृम्भिका प्राणिसंस्थिता।<br>जहृषुश्च सुराः सर्वे शक्रं दृष्ट्वा विनिर्गतम्॥ ३८उसी समयसे संसारके सभी प्राणियोंके शरीरमें जम्हाई विद्यमान रहने लगी। इन्द्रको बाहर निकला हुआ देखकर सभी देवता हर्षित हो उठे॥ ३८॥
ततः प्रवृत्ते युद्धं तयोर्लोकभयप्रदम्।<br>वर्षाणामयुतं यावद्दारुणं लोमहर्षणम्॥ ३९तब उन दोनोंमें तीनों लोकोंके लिये भयदायक, रोमांचकारी और भीषण युद्ध प्रारम्भ हो गया, जो दस हजार वर्षोंतक चला॥ ३९॥

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—24 D