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देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

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DevanagariHindipublished889 pages

Page 724 of 889

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Page 724
अ० ३४ ]पञ्चम स्कन्ध७१५
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
शुभे ताम्रमये पात्रे चन्दनेन सितेन च।<br>षट्कोणं विलिखेद्यन्त्रं चाष्टकोणं ततो बहिः॥ ७<br><br>° नवाक्षरस्य मन्त्रस्य बीजानि विलिखेत्ततः।<br>कृत्वा यन्त्रप्रतिष्ठाञ्च वेदोक्तां संविधाय च॥ ८<br><br>अर्चां वा धातवीं कुर्यात्पूजामन्त्रैः शिवोदितैः।<br>पूजनं पृथिवीपाल भगवत्याः प्रयत्नतः॥ ९<br><br>कृत्वा वा विधिवत्पूजामागमोक्तां समाहितः।<br>जपेन्नवाक्षरं मन्त्रं सततं ध्यानपूर्वकम्॥ १०<br><br>होमं दशांशतः कुर्याद्दशांशेन च तर्पणम्।<br>भोजनं ब्राह्मणानाञ्च तद्दशांशेन कारयेत्॥ ११<br><br>चरित्रत्रयपाठञ्च नित्यं कुर्याद्विसर्जयेत्।<br>नवरात्रव्रतं चैव विधेयं विधिपूर्वकम्॥ १२इसके बाद सुन्दर ताम्रपात्रपर श्वेत चन्दनसे षट्कोण यन्त्र तथा उसके बाहर अष्टकोण यन्त्र लिखना चाहिये। तदनन्तर नवाक्षर मन्त्रके आठ बीज अक्षर आठों कोणोंमें लिखना चाहिये और नौवाँ अक्षर यन्त्रकी कर्णिका (बीच)-में लिखना चाहिये। तदनन्तर वेदमें बतायी गयी विधिसे यन्त्रकी प्रतिष्ठा करके अथवा हे राजन्! भगवतीकी धातुमयी प्रतिमा बनाकर शिवतन्त्रोक्त पूजामन्त्रोंसे प्रयत्नपूर्वक पूजन करना चाहिये। अथवा सावधान होकर आगमशास्त्रमें बतायी गयी विधिसे विधानपूर्वक पूजन करके ध्यानपूर्वक नवाक्षरमन्त्रका सतत जप करना चाहिये। जपका दशांश होम करना चाहिये, होमका दशांश तर्पण करना चाहिये और तर्पणका दशांश ब्राह्मणभोजन कराना चाहिये। प्रतिदिन तीनों चरित्रों (प्रथम चरित्र, मध्यम चरित्र तथा उत्तर चरित्र)-का पाठ करना चाहिये। इसके बाद विसर्जन करना चाहिये॥ ७-११ १/२॥
आश्विने च तथा चैत्रे शुक्ले पक्षे नराधिप।<br>नवरात्रोपवासो वै कर्तव्यः शुभमिच्छता॥ १३हे राजन्! कल्याण चाहनेवालेको आश्विन और चैत्र माहके शुक्लपक्षमें विधिपूर्वक नवरात्रव्रत करना चाहिये। इन नवरात्रोंमें उपवास भी करना चाहिये॥ १२-१३॥
होमः सुविपुलः कार्यो जप्यमन्त्रैः सुपायसैः।<br>शर्कराघृतमिश्रैश्च मधुयुक्तैः सुसंस्कृतैः॥ १४<br><br>छागमांसेन वा कार्यो बिल्वपत्रैस्तथा शुभैः।<br>हयारिकुसुमै रक्तैस्तिलैर्वा शर्करायुतैः॥ १५<br><br>अष्टम्याञ्च चतुर्दश्यां नवम्याञ्च विशेषतः।<br>कर्तव्यं पूजनं देव्या ब्राह्मणानाञ्च भोजनम्॥ १६<br><br>निर्धनो धनमाप्नोति रोगी रोगात्प्रमुच्यते।<br>अपुत्रो लभते पुत्राञ्छुभांश्च वशवर्तिनः॥ १७<br><br>राज्यभ्रष्टो नृपो राज्यं प्राप्नोति सार्वभौमिकम्।<br>शत्रुभिः पीडितो हन्ति रिपुं मायाप्रसादतः॥ १८<br><br>विद्यार्थी पूजनं यस्तु करोति नियतेन्द्रियः।<br>अनवद्यां शुभां विद्यां विन्दते नात्र संशयः॥ १९अनुष्ठानमें जपे गये मन्त्रोंके द्वारा शर्करा, घी और मधुमिश्रित पवित्र खीरसे विस्तारपूर्वक हवन करना चाहिये अथवा उत्तम बिल्वपत्रों, लाल कनैलके पुष्पों अथवा शर्करामिश्रित तिलोंसे हवन करना चाहिये। अष्टमी, नवमी एवं चतुर्दशीको विशेषरूपसे देवीपूजन करना चाहिये और इस अवसरपर ब्राह्मणभोजन भी कराना चाहिये। ऐसा करनेसे निर्धनको धनकी प्राप्ति होती है, रोगी रोगमुक्त हो जाता है, पुत्रहीन व्यक्ति सुन्दर और आज्ञाकारी पुत्रोंको प्राप्त करता है और राज्यच्युत राजाको सार्वभौम राज्य प्राप्त हो जाता है। देवी महामायाकी कृपासे शत्रुओंसे पीड़ित मनुष्य अपने शत्रुओंका नाश कर देता है। जो विद्यार्थी इन्द्रियोंको वशमें करके इस पूजनको करता है, वह शीघ्र ही पुण्यमयी उत्तम विद्या प्राप्त कर लेता है; इसमें सन्देह नहीं है॥ १४-१९॥